अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 214, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः उत्तंकका सौदाससे उनकी रानीके कुण्डल माँगना और सौदासके कहनेसे रानी मदयन्तीके पास जाना वैशम्पायन उवाच स तं दृष्ट्वा तथाभूतं राजानं घोरदर्शनम् । दीर्घश्मश्रुधरं नृणां शोणितेन समुक्षितम् ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा सौदास राक्षस होकर बड़े भयानक दिखायी देते थे। उनकी मूँछ और दाढ़ी बहुत बड़ी थी। वे मनुष्योंके रक्तसे रँगे हुए थे ।। १ ।। चकार न व्यथां विप्रो राजा त्वेनमथाब्रवीत् । प्रत्युत्थाय महातेजा भयकर्ता यमोपमः ।। २ ।। उन्हें देखकर विप्रवर उत्तंकको तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्हें देखते ही महातेजस्वी राजा सौदास, जो यमराजके समान भयंकर थे, उठकर खड़े हो गये और उनके पास जाकर बोले— ।। २ ।। दिष्ट्या त्वमसि कल्याण षष्ठे काले ममान्तिकम् । भक्ष्यं मृगयमाणस्य सम्प्राप्तो द्विजसत्तम ।। ३ ।। ‘कल्याणस्वरूप द्विजश्रेष्ठ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि दिनके छठे भागमें आप स्वयं ही मेरे पास चले आये। मैं इस समय आहार ही ढूँढ़ रहा था’ ।। ३ ।। उत्तङ्क उवाच राजन् गुर्वर्थिनं विद्धि चरन्तं मामिहागतम् । न च गुर्वर्थमुद्युक्तं हिंस्यमाहुर्मनीषिणः ।। ४ ।। उत्तंक बोले—राजन्! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं गुरुदक्षिणाके लिये घूमता- फिरता यहाँ आया हूँ। जो गुरुदक्षिणा जुटानेके लिये उद्योगशील हो, उसकी हिंसा नहीं करनी चाहिये, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है ।। ४ ।। राजोवाच षष्ठे काले ममाहारो विहितो द्विजसत्तम । न शक्यस्त्वं समुत्स्रष्टुं क्षुधितेन मयाद्य वै ।। ५ ।। राजाने कहा—द्विजश्रेष्ठ! दिनके छठे भागमें मेरे लिये आहारका विधान किया गया है। यह वही समय है। मैं भूखसे पीड़ित हो रहा हूँ। इसलिये मेरे हाथोंसे तुम छूट नहीं सकते ।। ५ ।।