अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तङ्क उवाच एवमस्तु महाराज समयः क्रियतां तु मे । गुर्वर्थमभिनिर्वर्त्य पुनरेष्यामि ते वशम् ॥ ६ ॥ उत्तंकने कहा—महाराज! ऐसा ही सही, किंतु मेरे साथ एक शर्त कर लीजिये। मैं गुरुदक्षिणा चुकाकर फिर आपके वशमें आ जाऊँगा ।। ६ ।। संश्रुतश्च मया योऽर्थो गुरवे राजसत्तम । त्वदधीनः स राजेन्द्र तं त्वां भिक्षे नरेश्वर ॥ ७ ॥ राजेन्द्र! नृपश्रेष्ठ! मैंने गुरुको जो वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा की है, वह आपके ही अधीन है; अतः नरेश्वर! मैं आपसे उसकी भीख माँगता हूँ ।। ७ ।। ददासि विप्रमुख्येभ्यस्त्वं हि रत्नानि नित्यदा । दाता च त्वं नरव्याघ्र पात्रभूतः क्षिताविह । पात्रं प्रतिग्रहे चापि विद्धि मां नृपसत्तम ॥ ८ ॥ पुरुषसिंह! आप प्रतिदिन बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको रत्न प्रदान करते हैं। इस पृथ्वीपर आप एक श्रेष्ठ दानीके रूपमें प्रसिद्ध हैं और मैं भी दान लेनेका पात्र हूँ। नृपश्रेष्ठ! आप मुझे प्रतिग्रहका अधिकारी समझें ।। ८ ।। उपाहृत्य गुरोरर्थं त्वदायत्तमरिंदम । समयेनेह राजेन्द्र पुनरेष्यामि ते वशम् ॥ ९ ॥ शत्रुदमन राजेन्द्र! गुरुका धन जो आपके ही अधीन है, उन्हें अर्पित करके मैं अपनी की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार फिर आपके अधीन हो जाऊँगा ।। ९ ।। सत्यं ते प्रतिजानामि नात्र मिथ्या कथंचन । अनृतं नोक्तपूर्वं मे स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ॥ १० ॥ मैं आपसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ, इसमें किसी तरह मिथ्याके लिये स्थान नहीं है। मैं पहले कभी परिहासमें भी झूठ नहीं बोला हूँ, फिर अन्य अवसरोंपर तो बोल ही कैसे सकता हूँ ।। १० ।। सौदास उवाच यदि मत्तस्तवायत्तो गुर्वर्थः कृत एव सः । यदि चास्मि प्रतिग्राह्यः साम्प्रतं तद् वदस्व मे ॥ ११ ॥ सौदासने कहा—ब्रह्मन्! यदि आपकी गुरुदक्षिणा मेरे अधीन है तो उसे मिली हुई ही समझिये। यदि आप मेरी कोई वस्तु लेनेके योग्य मानते हैं तो बताइये, इस समय मैं आपको क्या दूँ? ।। ११ ।। उत्तङ्क उवाच प्रतिग्राह्यो मतो मे त्वं सदैव पुरुषर्षभ ।