अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसोऽहं त्वामनुसम्प्राप्तो भिक्षितुं मणिकुण्डले ॥ १२ ॥ उत्तंकने कहा—पुरुषप्रवर! आपका दिया हुआ दान मैं सदा ही ग्रहण करनेके योग्य मानता हूँ। इस समय मैं आपकी रानीके दोनों मणिमय कुण्डल माँगनेके लिये यहाँ आया हूँ ॥ १२ ॥ सौदास उवाच पत्न्यास्ते मम विप्रर्षे उचिते मणिकुण्डले । वरयार्थं त्वमन्यं वै तं ते दास्यामि सुव्रत ॥ १३ ॥ सौदासने कहा—ब्रह्मर्षे! वे मणिमय कुण्डल तो मेरी रानीके ही योग्य हैं। सुव्रत! आप और कोई वस्तु माँगिये, उसे मैं आपको अवश्य दे दूँगा ॥ १३ ॥ उत्तङ्क उवाच अलं ते व्यपदेशेन प्रमाणा यदि ते वयम् । प्रयच्छ कुण्डले मह्यं सत्यवाग् भव पार्थिव ॥ १४ ॥ उत्तंकने कहा—पृथ्वीनाथ! अब बहाना करना व्यर्थ है। यदि आप मुझपर विश्वास करते हैं तो वे दोनों मणिमय कुण्डल आप मुझे दे दें और सत्यवादी बनें ॥ १४ ॥ वैशम्पायन उवाच इत्युक्तस्त्वब्रवीद् राजा तमुत्तङ्कं पुनर्वचः । गच्छ मद्द्वचनाद् देवीं ब्रूहि देहीति सत्तम ॥ १५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उनके ऐसा कहनेपर राजा फिर उत्तंकसे बोले —‘साधुशिरोमणे! आप रानीके पास जाइये और मेरी आज्ञा सुनाकर कहिये। आप मुझे कुण्डल दे दें ॥ १५ ॥ सैवमुक्ता त्वया नूनं मद्वाक्येन शुचिव्रता । प्रदास्यति द्विजश्रेष्ठ कुण्डले ते न संशयः ॥ १६ ॥ ‘द्विजश्रेष्ठ! रानी उत्तम व्रतका पालन करनेवाली हैं। जब आप उनसे इस प्रकार कहेंगे, तब वे मेरी आज्ञा मानकर दोनों कुण्डल आपको दे देंगी, इसमें संशय नहीं है’ ॥ उत्तङ्क उवाच क्व पत्नी भवतः शक्या मया द्रष्टुं नरेश्वर । स्वयं वापि भवान् पत्नीं किमर्थं नोपसर्पति ॥ १७ ॥ उत्तंक बोले—नरेश्वर! मैं कहाँ आपकी पत्नीको ढूँढ़ता फिरूँगा? मुझे क्योंकर उनका दर्शन हो सकेगा? आप स्वयं ही अपनी पत्नीके पास क्यों नहीं चलते? ॥ सौदास उवाच