अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतां द्रक्ष्यति भवानद्य कस्मिंश्चिद् वननिर्झरे । षष्ठे काले न हि मया सा शक्या द्रष्टुमद्य वै ॥ १८ ॥ सौदासने कहा—ब्रह्मन्! उन्हें आज आप वनमें किसी झरनेके पास देखेंगे। यह दिनका छठा भाग है (मैं आहारकी खोजमें हूँ), अतः इस समय मैं उनसे नहीं मिल सकता ॥ १८ ॥ वैशम्पायन उवाच उत्तङ्कस्तु तथोक्तः स जगाम भरतर्षभ । मदयन्तीं च दृष्ट्वा स ज्ञापयत् स्वप्रयोजनम् ॥ १९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतभूषण! राजाके ऐसा कहनेपर उत्तंक मुनि महारानी मदयन्तीके पास गये और उनसे अपने आनेका प्रयोजन बतलाया ॥ १९ ॥ सौदासवचनं श्रुत्वा ततः सा पृथुलोचना । प्रत्युवाच महाबुद्धिमुत्तङ्कं जनमेजय ॥ २० ॥ जनमेजय! राजा सौदासका संदेश सुनकर विशाललोचना रानीने महाबुद्धिमान् उत्तंक मुनिको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ २० ॥ एवमेतद् वद ब्रह्मन् नानृतं वदसेऽनघ । अभिज्ञानं तु किंचित् त्वं समानयितुमर्हसि ॥ २१ ॥ 'ब्रह्मन्! आप जो कहते हैं, वह ठीक है। अनघ! यद्यपि आप असत्य नहीं बोलते हैं, तथापि आप महाराजके ही पाससे उन्हींका संदेश लेकर आये हैं, इस बातका कोई प्रमाण आपको लाना चाहिये ॥ २१ ॥ इमे हि दिव्ये मणिकुण्डले मे देवाश्च यक्षाश्च महर्षयश्च । तैस्तैरुपायैरपहर्तुकामा- श्छिद्रेषु नित्यं परितर्कयन्ति ॥ २२ ॥ 'मेरे ये दोनों मणिमय कुण्डल दिव्य हैं। देवता, यक्ष और महर्षि लोग नाना प्रकारके उपायोंद्वारा इसे चुरा ले जानेकी इच्छा रखते हैं और इसके लिये सदा छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं ॥ २२ ॥ निक्षिप्तमेतद् भुवि पन्नगास्तु रत्नं समासाद्य परामृशेयुः । यक्षास्तथोच्छिष्टधृतं सुराश्च निद्रावशाद् वा परिधर्षयेयुः ॥ २३ ॥ 'यदि इन कुण्डलोंको पृथ्वीपर रख दिया जाय तो नाग लोग इसे हड़प लेंगे। अपवित्र अवस्थामें इन्हें धारण करनेपर यक्ष उड़ा ले जायँगे और यदि इन्हें पहनकर नींद लेने लग