भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 421 में से

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पृष्ठ 218

जाय तो देवतालोग बलात् छीन ले जायँगे ॥ २३ ॥ छिद्रेष्वेतेष्विमे नित्यं ह्रियते द्विजसत्तम । देवराक्षसनागानामप्रमत्तेन धार्यते ॥ २४ ॥ ‘द्विजश्रेष्ठ! इन छिद्रोंमें इन दोनों कुण्डलोंके खो जानेका भय सदा बना रहता है। जो देवता, राक्षस और नागोंकी ओरसे सावधान होता है, वही इन्हें धारण कर सकता है ॥ २४ ॥ स्यन्देते हि दिवा रुक्मं रात्रौ च द्विजसत्तम । नक्तं नक्षत्रताराणां प्रभामाक्षिप्य वर्ततः ॥ २५ ॥ ‘द्विजश्रेष्ठ! ये दोनों कुण्डल रात-दिन सोना टपकाते रहते हैं। इतना ही नहीं, रातमें ये नक्षत्रों और तारोंकी प्रभाको भी छीन लेते हैं ॥ २५ ॥ एते ह्यामुच्य भगवन् क्षुत्पिपासाभयं कुतः । विषाग्निश्वपदादेभ्यश्च भयं जातु न विद्यते ॥ २६ ॥ ‘भगवन्! इन्हें धारण कर लेनेपर भूख-प्यासका भय कहाँ रह जाता है? विष, अग्नि और हिंसक जन्तुओंसे भी कभी भय नहीं होता है ॥ २६ ॥ ह्रस्वेन चैते आमुक्ते भवतो ह्रस्वके तदा । अनुरूपेण चामुक्ते जायेते तत्प्रमाणके ॥ २७ ॥ ‘छोटे कदका मनुष्य इन कुण्डलोंको पहने तो छोटे हो जाते हैं और बड़ी डील- डौलवाले मनुष्यके पहननेपर उसीके अनुरूप बड़े हो जाते हैं ॥ २७ ॥ एवंविधे ममैते वै कुण्डले परमार्चिते । त्रिषु लोकेषु विज्ञाते तदभिज्ञानमानय ॥ २८ ॥ ‘ऐसे गुणोंसे युक्त होनेके कारण मेरे ये दोनों कुण्डल तीनों लोकोंमें परम प्रशंसित एवं प्रसिद्ध हैं। अतः आप महाराजकी आज्ञासे इन्हें लेने आये हैं, इसका कोई पहचान या प्रमाण लाइये’ ॥ २८ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंक मुनिका उपाख्यानविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥

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