भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 222

यथा तयो रक्षणं च मदयन्त्याभिभाषितम् । तथा ते कुण्डले बद्ध्वा तदा कृष्णाजिनेऽनयत् ॥ १९ ॥ रानी मदयन्तीने उन कुण्डलोंकी रक्षाके लिये जैसी विधि बतायी थी, उसी प्रकार उन्हें काले मृगचर्ममें बाँधकर वे ले जा रहे थे ॥ १९ ॥ स कस्मिंश्चित् क्षुधाविष्टः फलभारसमन्वितम् । बिल्वं ददर्श विप्रर्षिरारुरोह च तं ततः ॥ २० ॥ शाखामासज्य तस्यैव कृष्णाजिनमरिंदम । पातयामास बिल्वानि तदा स द्विजपुङ्गवः ॥ २१ ॥ शत्रुदमन! रास्तेमें एक स्थानमें उन्हें बड़े जोरकी भूख लगी। वहाँ पास ही फलोंके भारसे झुका हुआ एक बेलका वृक्ष दिखायी दिया। ब्रह्मर्षि उत्तंक उस वृक्षपर चढ़ गये और उस काले मृगचर्मको उन्होंने उसकी एक शाखामें बाँध दिया। फिर वे ब्राह्मणपुंगव उस समय वहाँ बेल तोड़-तोड़कर गिराने लगे ॥ २०-२१ ॥ अथ पातयमानस्य बिल्वापहृतचक्षुषः । न्यपतंस्तानि बिल्वानि तस्मिन्नेवाजिने विभो ॥ २२ ॥ यस्मिंस्ते कुण्डले बद्धे तदा द्विजवरेण वै । उस समय उनकी दृष्टि बेलोंपर ही लगी हुई थी (वे कहाँ गिरते हैं, इसकी ओर उनका ध्यान नहीं था)। प्रभो! उनके तोड़े हुए प्रायः सभी बेल उस मृगछालापर ही, जिसमें उन विप्रवरने वे दोनों कुण्डल बाँध रखे थे, गिरे ॥ २२ १/२ ॥ बिल्वप्रहारैस्तस्याथ व्यशीर्यद् बन्धनं ततः ॥ २३ ॥ सकुण्डलं तदजिनं पपात सहसा तरोः । उन बेलोंकी चोटसे बन्धन टूट गया और कुण्डलसहित वह मृगचर्म सहसा वृक्षसे नीचे जा गिरा ॥ २३ १/२ ॥ विशीर्णबन्धने तस्मिन् गते कृष्णाजिने महीम् ॥ २४ ॥ अपश्यद् भुजगः कश्चित् ते तत्र मणिकुण्डले । ऐरावतकुलोद्भूतः शीघ्रो भूत्वा तदा हि सः ॥ २५ ॥ विदश्यास्येन वल्मीकं विवेशाथ स कुण्डले । बन्धन टूट जानेपर उस काले मृगछालाके पृथ्वीपर गिरते ही किसी सर्पकी दृष्टि उसपर पड़ी। वह ऐरावतके कुलमें उत्पन्न हुआ तक्षक था। उसने मृगछालाके भीतर रखे हुए उस मणिमय कुण्डलोंको देखा। फिर तो बड़ी शीघ्रता करके वह उन कुण्डलोंको दाँतोंमें दबाकर एक बाँबीमें घुस गया ॥ २४-२५ १/२ ॥ ह्रियमाणे तु दृष्ट्वा स कुण्डले भुजगेन ह ॥ २६ ॥ पपात वृक्षात् सोद्वेगो दुःखात् परमकोपनः । स दण्डकाष्ठमादाय वल्मीकमखनत् तदा ॥ २७ ॥