भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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सर्पके द्वारा कुण्डलोंका अपहरण होता देख उत्तंक मुनि उद्विग्न हो उठे और अत्यन्त क्रोधमें भरकर वृक्षसे कूद पड़े। आकर एक काठका डंडा हाथमें ले उसीसे उस बाँबीको खोदने लगे ॥ २६-२७ ॥ अहानि त्रिंशद्व्यग्रः पञ्च चान्यानि भारत । क्रोधामर्षाभिसंतप्तस्तदा ब्राह्मणसत्तमः ॥ २८ ॥ भरतनन्दन! ब्राह्मणशिरोमणि उत्तंक क्रोध और अमर्षसे संतप्त हो लगातार पैंतीस दिनोंतक बिना किसी घबराहटके बिल खोदनेके कार्यमें जुटे रहे ॥ २८ ॥ तस्य वेगमसह्यं तमसहन्ती वसुन्धरा । दण्डकाष्ठाभिनुन्नाङ्गी चचाल भृशमाकुला ॥ २९ ॥ उनके उस असह्य वेगको पृथ्वी भी नहीं सह सकी। वह डंडेकी चोटसे घायल एवं अत्यन्त व्याकुल होकर डगमगाने लगी ॥ २९ ॥ ततः खनत एवाथ विप्रर्षेर्धरणीतलम् । नागलोकस्य पन्थानं कर्तुकामस्य निश्चयात् ॥ ३० ॥ रथेन हरियुक्तेन तं देशमुपजग्मिवान् । वज्रपाणिर्महातेजास्तं ददर्श द्विजोत्तमम् ॥ ३१ ॥ उत्तंक नागलोकमें जानेका मार्ग बनानेके लिये निश्चय करके धरती खोदते ही जा रहे थे कि महातेजस्वी वज्रधारी इन्द्र घोड़े जुते हुए रथपर बैठकर उस स्थानपर आ पहुँचे और विप्रवर उत्तंकसे मिले ॥ ३०-३१ ॥ वैशम्पायन उवाच स तु तं ब्राह्मणो भूत्वा तस्य दुःखेन दुःखितः । उत्तङ्कमब्रवीद् वाक्यं नैतच्छक्यं त्वयेति वै ॥ ३२ ॥ इतो हि नागलोको वै योजनानि सहस्रशः । न दण्डकाष्ठसाध्यं च मन्ये कार्यमिदं तव ॥ ३३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इन्द्र उत्तंकके दुःखसे दुःखी थे। अतः ब्राह्मणका वेष बनाकर उनसे बोले—‘ब्रह्मन्! यह काम तुम्हारे वशका नहीं है। नागलोक यहाँसे हजारों योजन दूर है। इस काठके डंडेसे वहाँका रास्ता बने, यह कार्य सधनेवाला नहीं जान पड़ता’ ॥ ३२-३३ ॥