अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततः स पूजितो नागैस्तदोत्तङ्कः प्रतापवान् । अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा जगाम गुरुसद्म तत् ॥ ५७ ॥ तदनन्तर नागोंसे सम्मानित होकर प्रतापी उत्तंक मुनि अग्निदेवकी प्रदक्षिणा करके गुरुके आश्रमकी ओर चल दिये ॥ ५७ ॥ स गत्वा त्वरितो राजन् गौतमस्य निवेशनम् । प्रायच्छत् कुण्डले दिव्ये गुरुपत्नयास्तदानघ ॥ ५८ ॥ निष्पाप नरेश! वहाँ गौतमके घरमें शीघ्रतापूर्वक पहुँचकर उन्होंने गुरुपत्नीको वे दोनों दिव्य कुण्डल दे दिये ॥ ५८ ॥ वासुकिप्रमुखानां च नागानां जनमेजय । सर्वं शशंस गुरवे यथावद् द्विजसत्तमः ॥ ५९ ॥ जनमेजय! वासुकि आदि नागोंके यहाँ जो घटना घटी थी, उसका सारा समाचार द्विजश्रेष्ठ उत्तंकने अपने गुरु महर्षि गौतमसे ठीक-ठीक कह सुनाया ॥ ५९ ॥ एवं महात्मना तेन त्रींल्लोकान् जनमेजय । परिक्रम्याहृते दिव्ये ततस्ते मणिकुण्डले ॥ ६० ॥ जनमेजय! इस प्रकार महात्मा उत्तंकने तीनों लोकोंमें घूमकर वे मणिमय दिव्य कुण्डल प्राप्त किये थे ॥ ६० ॥ एवंप्रभावः स मुनिरुत्तङ्को भरतर्षभ । परेण तपसा युक्तो यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ६१ ॥ भरतश्रेष्ठ! उत्तंक मुनि, जिनके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे थे, ऐसे ही प्रभावशाली और महान् तपस्वी थे ॥ ६१ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंकका उपाख्यानविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥