अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनषष्टितमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका द्वारकामें जाकर रैवतक पर्वतपर महोत्सवमें सम्मिलित होना और सबसे मिलना
जनमेजय उवाच उत्तङ्कस्य वरं दत्त्वा गोविन्दो द्विजसत्तम । अत ऊर्ध्वं महाबाहुः किं चकार महायशाः ॥ १ ॥ **जनमेजयने पूछा—**द्विजश्रेष्ठ! महायशस्वी महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने उत्तंकको वरदान देनेके पश्चात् क्या किया? ॥ १ ॥ वैशम्पायन उवाच उत्तङ्काय वरं दत्त्वा प्रायात् सात्यकिना सह । द्वारकामेव गोविन्दः शीघ्रवेगैर्महाहयैः ॥ २ ॥ **वैशम्पायनजीने कहा—**उत्तंकको वर देकर भगवान् श्रीकृष्ण महान् वेगशाली शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा सात्यकि (और सुभद्रा)-के साथ पुनः द्वारकाकी ओर ही चल दिये ॥ २ ॥ सरांसि सरितश्चैव वनानि च गिरींस्तथा । अतिक्रम्याससादाथ रम्यां द्वारवतीं पुरीम् ॥ ३ ॥ वर्तमाने महाराज महे रैवतकस्य च । उपायात् पुण्डरीकाक्षो युयुधानानुगस्तदा ॥ ४ ॥ मार्गमें अनेकानेक सरोवरों, सरिताओं, वनों और पर्वतोंको लाँघकर वे परम रमणीय द्वारका नगरीमें जा पहुँचे। महाराज! उस समय वहाँ रैवतक पर्वतपर कोई बड़ा भारी उत्सव मनाया जा रहा था। सात्यकिको साथ लिये कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण भी उस समय उस महोत्सवमें पधारे ॥ ३-४ ॥ अलंकृतस्तु स गिरिर्नानारूपैर्विचित्रितैः । बभौ रत्नमयैः कोशैः संवृतः पुरुषर्षभ ॥ ५ ॥ पुरुषप्रवर! वह पर्वत नाना प्रकारके विचित्र रत्नमय ढेरोंद्वारा सजाया गया था, उस समय उसकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥ ५ ॥ काञ्चनस्रग्भिरग्र्याभिः सुमनोभिस्तथैव च । वासोभिश्च महाशैलः कल्पवृक्षैस्तथैव च ॥ ६ ॥ सोनेकी सुन्दर मालाओं, भाँति-भाँतिके पुष्पों, वस्त्रों और कल्पवृक्षोंसे घिरे हुए उस महान् शैलकी अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ ६ ॥