अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपवृक्षैश्च सौवर्णैरभीक्ष्णमुपशोभितः । गुहानिर्झरदेशेषु दिवाभूतो बभूव ह ॥ ७ ॥ वृक्षके आकारमें सजाये हुए सोनेके दीप उस स्थानकी शोभाको और भी उद्दीप्त कर रहे थे। वहाँकी गुफाओं और झरनोंके स्थानोंमें दिनके समान प्रकाश हो रहा था ॥ ७ ॥ पताकाभिर्विचित्राभिः सघण्टाभिः समन्ततः । पुम्भिः स्त्रीभिश्च संघुष्टः प्रगीत इव चाभवत् ॥ ८ ॥ चारों ओर विचित्र पताकाएँ फहरा रही थीं, उनमें बँधी हुई घण्टियाँ बज रही थीं और स्त्रियों तथा पुरुषोंके सुमधुर शब्द वहाँ व्याप्त हो रहे थे। इससे वह पर्वत संगीतमय-सा प्रतीत हो रहा था ॥ ८ ॥ अतीव प्रेक्षणीयोऽभून्मेरुर्मुनिगणैरिव । मत्तानां हृष्टरूपाणां स्त्रीणां पुंसां च भारत ॥ ९ ॥ गायतां पर्वतेन्द्रस्य दिवस्पृगिव निःस्वनः । जैसे मुनिगणोंसे मेरुकी शोभा होती है, उसी प्रकार द्वारकावासियोंके समागमसे वह पर्वत अत्यन्त दर्शनीय हो गया था। भरतनन्दन! उस पर्वतराजके शिखरपर हर्षोन्मत्त होकर गाते हुए स्त्री-पुरुषोंका सुमधुर शब्द मानो स्वर्गलोकतक व्याप्त हो रहा था ॥ ९ १/२ ॥ प्रमत्तमत्तसम्मतक्ष्वेडितोत्कृष्टसंकुलः ॥ १० ॥ तथा किलकिलाशब्दैर्भूधरोऽभून्मनोहरः । कुछ लोग क्रीडा आदिमें आसक्त होकर दूसरे कार्योंकी ओर ध्यान नहीं देते थे, कितने ही हर्षसे मतवाले हो रहे थे, कुछ लोग कूदते-फाँदते, उच्च स्वरसे कोलाहल करते और किलकारियाँ भरते थे। इन सभी शब्दोंसे गूँजता हुआ पर्वत परम मनोहर जान पड़ता था ॥ १० १/२ ॥ विपणापणवान् रम्यो भक्ष्यभोज्यविहारवान् ॥ ११ ॥ वस्त्रमाल्योत्करयुतो वीणावेणुमृदङ्गवान् । सुरामैरेयमिश्रेण भक्ष्यभोज्येन चैव ह ॥ १२ ॥ दीनान्धकृपणादिभ्यो दीयमानेन चानिशम् । बभौ परमकल्याणो महस्तस्य महागिरेः ॥ १३ ॥ उस महान् पर्वतपर होनेवाला वह महोत्सव परम मंगलमय प्रतीत होता था। वहाँ दूकानें और बाजार लगी थीं। भक्ष्य-भोज्य पदार्थ यथेष्ट रूपसे प्राप्त होते थे। सब ओर घूमने-फिरनेकी सुविधा थी। वस्त्रों और मालाओंके ढेर लगे थे। वीणा, वेणु और मृदंग बज रहे थे। इन सबके कारण वहाँकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी। वहाँ दीनों, अन्धों और अनाथोंके लिये निरन्तर सुरा-मैरेयमिश्रित भक्ष्य-भोज्य पदार्थ दिये जाते थे ॥ ११—१३ ॥ पुण्यावसथवान् वीर पुण्यकृद्भिर्निषेवितः । विहारो वृष्णिवीराणां महे रैवतकस्य ह ॥ १४ ॥