अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्टितमोऽध्यायः वसुदेवजीके पूछनेपर श्रीकृष्णका उन्हें महाभारत-युद्धका वृत्तान्त संक्षेपसे सुनाना वसुदेव उवाच श्रुतवानस्मि वार्ष्णेय संग्रामं परमाद्भुतम् । नराणां वदतां तत्र कथं वा तेषु नित्यशः ॥ १ ॥ वसुदेवजीने पूछा—वृष्णिनन्दन! मैं प्रतिदिन बातचीतके प्रसंगमें लोगोंके मुँहसे सुनता आ रहा हूँ कि महाभारत-युद्ध बड़ा अद्भुत हुआ था। इसलिये पूछता हूँ कि कौरवों और पाण्डवोंमें किस तरह युद्ध हुआ? ॥ १ ॥ त्वं तु प्रत्यक्षदर्शी च रूपज्ञश्च महाभुज । तस्मात् प्रब्रूहि संग्रामं याथातथ्येन मेऽनघ ॥ २ ॥ महाबाहो! तुम तो उस युद्धके प्रत्यक्षदर्शी हो और उसके स्वरूपको भी भलीभाँति जानते हो; अतः अनघ! मुझसे उस युद्धका यथार्थ वर्णन करो ॥ २ ॥ यथा तदभवद् युद्धं पाण्डवानां महात्मनाम् । भीष्मकर्णकृपद्रोणशल्यादिभिरनुत्तमम् ॥ ३ ॥ महात्मा पाण्डवोंका भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य और शल्य आदिके साथ जो परम उत्तम युद्ध हुआ था, वह किस तरह हुआ? ॥ ३ ॥ अन्येषां क्षत्रियाणां च कृतास्त्राणामनेकशः । नानावेषाकृतिम तां नानादेशनिवासिनाम् ॥ ४ ॥ दूसरे-दूसरे देशोंमें निवास करनेवाले, भाँति-भाँतिकी वेशभूषा और आकृतिवाले जो अस्त्र-विद्यामें निपुण बहुसंख्यक क्षत्रिय वीर थे, उन्होंने भी किस प्रकार युद्ध किया था? ॥ ४ ॥ वैशम्पायन उवाच इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षः पित्रा मातुस्तदन्तिके । शशंस कुरुवीराणां संग्रामे निधनं यथा ॥ ५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—माताके निकट पिताके इस प्रकार पूछनेपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण कौरव वीरोंके संग्राममें मारे जानेका वह प्रसंग यथावत् रूपसे सुनाने लगे ॥ ५ ॥ वासुदेव उवाच अत्यद्भुतानि कर्माणि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।