अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 238, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंबहुलत्वान्न संख्यातुं शक्यान्यब्दशतैरपि ॥ ६ ॥ श्रीकृष्णने कहा—पिताजी! महाभारत-युद्धमें काममें आनेवाले मनस्वी क्षत्रिय वीरोंके कर्म बड़े अद्भुत हैं। वे इतने अधिक हैं कि यदि विस्तारके साथ उनका वर्णन किया जाय तो सौ वर्षोंमें भी उनकी समाप्ति नहीं हो सकती ॥ ६ ॥ प्राधान्यतस्तु गदतः समासेनैव मे शृणु । कर्माणि पृथिवीशानां यथावदमरद्युते ॥ ७ ॥ अतः देवताओंके समान तेजस्वी तात! मैं मुख्य-मुख्य घटनाओंको ही संक्षेपसे सुना रहा हूँ, आप उन भूपतियोंके कर्म यथावत् रूपसे सुनिये ॥ ७ ॥ भीष्मः सेनापतिरभूदेकादशचमूपतिः । कौरव्यः कौरवेन्द्राणां देवानाामिव वासवः ॥ ८ ॥ जैसे इन्द्र देवताओंकी सेनाके स्वामी हैं, उसी प्रकार कुरुकुलतिलक भीष्म भी श्रेष्ठ कौरववीरोंके सेनापति बनाये गये थे। वे ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके संरक्षक थे ॥ ८ ॥ शिखण्डी पाण्डुपुत्राणां नेता सप्तचमूपतिः । बभूव रक्षितो धीमान् श्रीमता सव्यसाचिना ॥ ९ ॥ पाण्डवोंके सेनानायक शिखण्डी थे, जो सात अक्षौहिणी सेनाओंका संचालन करते थे। बुद्धिमान् शिखण्डी श्रीमान् सव्यसाची अर्जुनके द्वारा सुरक्षित थे ॥ ९ ॥ तेषां तदभवद् युद्धं दशाहानि महात्मनाम् । कुरूणां पाण्डवानां च सुमहल्लोमहर्षणम् ॥ १० ॥ उन महामनस्वी कौरवों और पाण्डवोंमें दस दिनोंतक महान् रोमांचकारी युद्ध हुआ ॥ १० ॥ ततः शिखण्डी गाङ्गेयं युध्यमानं महाहवे । जघान बहुभिर्बाणैः सह गाण्डीवधन्वना ॥ ११ ॥ फिर दसवें दिन शिखण्डीने महासमरमें जूझते हुए गङ्गानन्दन भीष्मको गाण्डीवधारी अर्जुनकी सहायतासे बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बहुत घायल कर दिया ॥ ११ ॥ अकरोत् स ततः कालं शरतल्पगतो मुनिः । अयनं दक्षिणं हित्वा सम्प्राप्ते चोत्तरायणे ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् भीष्मजी बाणशय्यापर पड़ गये। जबतक दक्षिणायन रहा है, वे मुनिव्रतका पालन करते हुए शरशय्यापर सोते रहे हैं। दक्षिणायन समाप्त होकर उत्तरायणके आनेपर ही उन्होंने मृत्यु स्वीकार की है ॥ १२ ॥ ततः सेनापतिरभूद् द्रोणोऽस्त्रविदुषां वरः । प्रवीरः कौरवेन्द्रस्य काव्यो दैत्यपतेरिव ॥ १३ ॥ तदनन्तर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोण कौरवपक्षके सेनापति बनाये गये। वे कौरवराजकी सेनाके प्रमुख वीर थे, मानो दैत्यराज बलिके सेनाके प्रधान संरक्षक