अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिषष्टितमोऽध्यायः युधिष्ठिरका अपने भाइयोंके साथ परामर्श करके सबको साथ ले धन ले आनेके लिये प्रस्थान करना जनमेजय उवाच श्रुत्वैतद् वचनं ब्रह्मन् व्यासेनोक्तं महात्मना । अश्वमेधं प्रति तदा किं भूयः प्रचकार ह ॥ १ ॥ रत्नं च यन्मरुत्तेन निहितं वसुधातले । तदवाप कथं चेति तन्मे ब्रूहि द्विजोत्तम ॥ २ ॥ जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! महात्मा व्यासका कहा हुआ यह वचन सुनकर राजा युधिष्ठिरने अश्वमेध यज्ञके सम्बन्धमें फिर क्या किया? राजा मरुत्तने जो रत्न पृथ्वीतलपर रख छोड़ा था, उसे उन्होंने किस प्रकार प्राप्त किया? द्विजश्रेष्ठ! यह सब मुझे बताइये ॥ १-२ ॥ वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा द्वैपायनवचो धर्मराजो युधिष्ठिरः । भ्रातृन् सर्वान् समानाय्य काले वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥ अर्जुनं भीमसेनं च माद्रीपुत्रौ यमावपि । वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! व्यासजीकी बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव—इन सभी भाइयोंको बुलवाकर यह समयोचित वचन कहा— ॥ ३ १/२ ॥ श्रुतं वो वचनं वीराः सौहृदाद् यन्महात्मना ॥ ४ ॥ कुरूणां हितकामेन प्रोक्तं कृष्णेन धीमता । ‘वीर बन्धुओ! कौरवोंके हितकी कामना रखनेवाले बुद्धिमान् महात्मा श्रीकृष्णने सौहार्दवश जो बात कही थी, वह सब तो तुमने सुनी ही थी ॥ ४ १/२ ॥ तपोवृद्धेन महता सुहृदां भूतिमिच्छता ॥ ५ ॥ गुरुणा धर्मशीलेन व्यासेनाद्भुतकर्मणा । भीष्मेण च महाप्राज्ञा गोविन्देन च धीमता ॥ ६ ॥ संस्मृत्य तदहं सम्यक् कर्तुमिच्छामि पाण्डवाः । आयत्यां च तदात्वे च सर्वेषां तद्धि नो हितम् ॥ ७ ॥ ‘सुहृदोंकी भलाई चाहनेवाले महान् तपोवृद्ध महात्मा धर्मशील गुरु व्यासने, अद्भुत पराक्रमी भीष्मने तथा बुद्धिमान् गोविन्दने समय-समयपर जो सलाह दी है, उसे याद करके