अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमैं उनके आदेशका भलीभाँति पालन करना चाहता हूँ। महाप्राज्ञ पाण्डवो! उन महात्माओंका यह वचन भविष्य और वर्तमानमें भी हम सबके लिये हितकारक है ॥ ५— ७॥ अनुबन्धे च कल्याणं यद् वचो ब्रह्मवादिनः । इयं हि वसुधा सर्वा क्षीणरत्ना कुरूद्वहाः ॥ ८ ॥ तच्चाचष्ट तदा व्यासो मरुत्तस्य धनं नृपाः । 'ब्रह्मवादी महात्मा व्यासजीका वचन परिणाममें हमारा कल्याण करनेवाला है। कौरवो! इस समय इस सारी पृथिवीपर रत्न एवं धनका नाश हो गया है; अतः हमारी आर्थिक कठिनाई दूर करनेके लिये व्यासजीने उस दिन हमें मरुत्तके धनका पता बताया था ॥ ८ १/२ ॥ यद्येतद् वो बहुमतं मन्यध्वं वा क्षमं यदि ॥ ९ ॥ तथा यथाऽऽह धर्मेण कथं वा भीम मन्यसे । 'यदि तुमलोग उस धनको पर्याप्त समझो और उसे ले आनेकी अपनेमें सामर्थ्य देखो तो व्यासजीने जैसा कहा है, उसीके अनुसार धर्मतः उसे प्राप्त करनेका यत्न करो। अथवा भीमसेन! तुम बोलो, तुम्हारा इस सम्बन्धमें क्या विचार है?' ॥ ९ १/२ ॥ इत्युक्तवाक्ये नृपतौ तदा कुरुकुलोद्वह ॥ १० ॥ भीमसेनो नृपश्रेष्ठं प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् । रोचते मे महाबाहो यदिदं भाषितं त्वया ॥ ११ ॥ व्यासाख्यातस्य वित्तस्य समुपानयनं प्रति । कुरुकुलशिरोमणे! राजा युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर भीमसेनने हाथ जोड़कर उन नृपश्रेष्ठसे इस प्रकार कहा—'महाबाहो! आपने जो कुछ कहा है, व्यासजीके बताये हुए धनको लानेके विषयमें जो विचार व्यक्त किया है, वह मुझे बहुत पसंद है ॥ १०-११ १/२ ॥ यदि तत् प्राप्नुयामेह धनमाविक्षितं प्रभो ॥ १२ ॥ कृतमेव महाराज भवेदिति मतिर्मम । 'प्रभो! महाराज! यदि हमें मरुत्तका धन प्राप्त हो जाय तब तो हमारा सारा काम बन ही जाय। यही मेरा मत है ॥ १२ १/२ ॥ ते वयं प्रणिपातेन गिरीशस्य महात्मनः ॥ १३ ॥ तदानयाम भद्रं ते समभ्यर्च्य कपर्दिनम् । 'आपका कल्याण हो। हम महात्मा गिरीशके चरणोंमें प्रणाम करके उन जटाजूटधारी महेश्वरकी सम्यक् आराधना करके उस धनको ले आवें ॥ १३ १/२ ॥ तद् वित्तं देवदेवेशं तस्यैवानुचरांश्च तान् ॥ १४ ॥ प्रसाद्यार्थमवाप्स्यामो नूनं वाग्बुद्धि कर्मभिः ।