अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुःषष्टितमोऽध्यायः पाण्डवोंका हिमालयपर पहुँचकर वहाँ पड़ाव डालना और रातमें उपवासपूर्वक निवास करना वैशम्पायन उवाच ततस्ते प्रययुर्हृष्टाः प्रहृष्टनरवाहनाः । रथघोषेण महता पूरयन्तो वसुंधराम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डवोंके साथ जो मनुष्य और वाहन थे, वे सब-के-सब बड़े हर्षमें भरे हुए थे। वे स्वयं भी अपने रथके महान् घोषसे इस पृथ्वीको गुँजाते हुए प्रसन्नतापूर्वक यात्रा कर रहे थे ॥ १ ॥ संस्तूयमानाः स्तुतिभिः सूतमागधवन्दिभिः । स्वेन सैन्येन संवीता यथादित्याः स्वरश्मिभिः ॥ २ ॥ सूत, मागध और वन्दीजन अनेक प्रकारके प्रशंसासूचक वचनोंद्वारा उनके गुण गाते चलते थे। अपनी सेनासे घिरे हुए पाण्डव ऐसे जान पड़ते थे, मानो अपनी किरणमालाओंसे मण्डित सूर्य प्रकाशित हो रहे हों ॥ २ ॥ पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि । बभौ युधिष्ठिरस्तत्र पौर्णमास्यामिवोडुराट् ॥ ३ ॥ राजा युधिष्ठिरके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे वे वहाँ पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे ॥ ३ ॥ जयाशिषः प्रहृष्टानां नराणां पथि पाण्डवः । प्रत्यगृह्णाद् यथान्यायं यथावत् पुरुषर्षभः ॥ ४ ॥ मार्गमें बहुत-से मनुष्य प्रसन्न होकर राजा युधिष्ठिरको विजयसूचक आशीर्वाद देते थे और वे पुरुषशिरोमणि नरेश यथोचितरूपसे सिर झुकाकर उन यथार्थ वचनोंको ग्रहण करते थे ॥ ४ ॥ तथैव सैनिका राजन् राजानमनुयान्ति ये । तेषां हलहलाशब्दो दिवं स्तब्ध्वा व्यतिष्ठत ॥ ५ ॥ राजन्! राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे जो बहुत-से सैनिक चल रहे थे, उनका महान् कोलाहल आकाशको स्तब्ध करके गूँज उठता था ॥ ५ ॥ सरांसि सरितश्चैव वनान्युपवनानि च । अत्यक्रामन्महाराजो गिरिं चाप्यन्वपद्यत ॥ ६ ॥ तस्मिन् देशे च राजेन्द्र यत्र तद् द्रव्यमुत्तमम् ।