भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 259

राजन्! अनेकानेक सरोवरों, सरिताओं, वनों, उपवनों तथा पर्वतको लाँघकर महाराज युधिष्ठिर उस स्थानमें जा पहुँचे, जहाँ वह (राजा मरुत्तका रखा हुआ) उत्तम द्रव्य संचित था ।। ६ १/२ ।। चक्रे निवेशनं राजा पाण्डवः सह सैनिकैः । शिवे देशे समे चैव तदा भरतसत्तम ।। ७ ।। अग्रतो ब्राह्मणान् कृत्वा तपोविद्यादमान्वितान् । पुरोहितं च कौरव्य वेदवेदाङ्गपारगम् । आग्निवेश्यं च राजानो ब्राह्मणाः सपुरोधसः ।। ८ ।। कृत्वा शान्तिं यथान्यायं सर्वशः पर्यवारयन् । कृत्वा तु मध्ये राजानममात्यांश्च यथाविधि ।। ९ ।। कुरुवंशी भरतश्रेष्ठ! वहाँ एक समतल एवं सुखद स्थानमें पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने तप, विद्या और इन्द्रिय-संयमसे युक्त ब्राह्मणों एवं वेद-वेदांगके पारगामी विद्वान् राजपुरोहित धौम्य मुनिको आगे रखकर सैनिकोंके साथ पड़ाव डाला। बहुत-से राजा, ब्राह्मण और पुरोहितने यथोचित रीतिसे शान्तिकर्म करके युधिष्ठिर और उनके मन्त्रियोंको विधिपूर्वक बीचमें रखकर उन्हें सब ओरसे घेर रखा था ।। ७—९ ।। षट्पदं नवसंख्यानं निवेशं चक्रिरे द्विजाः । मत्तानां वारणेन्द्राणां निवेशं च यथाविधि ।। १० ।। कारयित्वा स राजेन्द्रो ब्राह्मणानिदमब्रवीत् । ब्राह्मणोंने जो छावनी वहाँ बनायी थी, उसमें पूर्वसे पश्चिमको और उत्तरसे दक्षिणको जानेवाली तीन-तीनके क्रमसे कुल छः सड़कें थीं तथा उस छावनीके नौ खण्ड थे। महाराज युधिष्ठिरने मतवाले गजराजोंके रहनेके लिये भी स्थानका विधिवत् निर्माण कराकर ब्राह्मणोंसे इस प्रकार कहा— ।। १० १/२ ।। अस्मिन् कार्ये द्विजश्रेष्ठा नक्षत्रे दिवसे शुभे ।। ११ ।। यथा भवन्तो मन्यन्ते कर्तुमर्हन्ति तत् तथा । न नः कालात्ययो वै स्यादिहैव परिलम्बताम् ।। १२ ।। इति निश्चित्य विप्रेन्द्राः क्रियतां यदनन्तरम् । ‘विप्रवरो! किसी शुभ नक्षत्र और शुभ दिनको इस कार्यकी सिद्धिके लिये आपलोग जो भी ठीक समझें, वह उपाय करें। ऐसा न हो कि यहीं लटके रहकर हमारा बहुत अधिक समय व्यतीत हो जाय। द्विजेन्द्रगण! इस विषयमें कुछ निश्चय करके इस समय जो करना उचित हो, उसे आप लोग अविलम्ब करें’ ।। ११-१२ १/२ ।। श्रुत्वैतद् वचनं राज्ञो ब्राह्मणाः सपुरोधसः । इदमूचुर्वचो हृष्टा धर्मराजप्रियेप्सवः ।। १३ ।।