अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 260, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंधर्मराज राजा युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर उनका प्रिय करनेकी इच्छावाले ब्राह्मण और पुरोहित प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार बोले— ॥ १३ ॥ अद्यैव नक्षत्रमहश्च पुण्यं यतामहे श्रेष्ठतमक्रियासु । अम्भोभिरद्येह वसाम राज- न्नुपोष्यतां चापि भवद्भिरद्य ॥ १४ ॥ 'राजन्! आज ही परम पवित्र नक्षत्र और शुभ दिन है; अतः आज ही हम श्रेष्ठतम कर्म करनेका प्रयत्न आरम्भ करते हैं। हमलोग तो आज केवल जल पीकर रहेंगे और आपलोगोंको भी आज उपवास करना चाहिये' ॥ १४ ॥ श्रुत्वा तु तेषां द्विजसत्तमानां कृतोपवासा रजनीं नरेन्द्राः । ऊषुः प्रतीताः कुशसंस्तरेषु यथाध्वरे प्रज्वलिता हुताशाः ॥ १५ ॥ उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका यह वचन सुनकर समस्त पाण्डव रातमें उपवास करके कुशकी चटाइयोंपर निर्भय होकर सोये। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो यज्ञमण्डपमें पाँच वेदियोंपर स्थापित पाँच अग्नि प्रज्वलित हो रहे हों ॥ १५ ॥ ततो निशा सा व्यगमन्महात्मनां संशृण्वतां विप्रसमीरिता गिरः । ततः प्रभाते विमले द्विजर्षभा वचोऽब्रुवन् धर्मसुतं नराधिपम् ॥ १६ ॥ तदनन्तर ब्राह्मणोंकी कही हुई बातें सुनते हुए महात्मा पाण्डवोंकी वह रात सकुशल व्यतीत हुई। फिर निर्मल प्रभातका उदय होनेपर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने धर्मनन्दन राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा ॥ १६ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापरवनि द्रव्यानयनोपक्रमे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्र्वमें द्रव्य लानेका उपक्रमविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
- ज्योतिष शास्त्रके अनुसार तीनों उत्तरा तथा रोहिणी—ये ध्रुवसंज्ञक नक्षत्र हैं। दिनोंमें रविवारको ध्रुव बताया गया है। उत्तरा और रविवारका संयोग होनेपर अमृतसिद्धि नामक योग होता है; अतः इसी योगमें पाण्डवोंके प्रस्थान करनेका अनुमान किया जा सकता है।