अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषट्षष्टितमोऽध्यायः श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें आगमन और उत्तराके मृत बालकको जिलानेके लिये कुन्तीकी उनसे प्रार्थना वैशम्पायन उवाच एतस्मिन्नेव काले तु वासुदेवोऽपि वीर्यवान् । उपायाद् वृष्णिभिः सार्धं पुरं वारणसाह्वयम् ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इसी बीचमें परम पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण भी वृष्णिवंशियोंको साथ लेकर हस्तिनापुर आ गये ।। १ ।। समयं वाजिमेधस्य विदित्वा पुरुषर्षभः । यथोक्तो धर्मपुत्रेण प्रव्रजन् स्वपुरीं प्रति ।। २ ।। उनके द्वारका जाते समय धर्मपुत्र युधिष्ठिरने जैसी बात कही थी, उसके अनुसार अश्वमेध यज्ञका समय निकट जानकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण पहले ही उपस्थित हो गये ।। २ ।। रौक्मिणेयेन सहितो युयुधानेन चैव ह । चारुदेष्णेन साम्बेन गदेन कृतवर्मणा ।। ३ ।। सारणेन च वीरेण निशठोन्मुखेन च । उनके साथ रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, सात्यकि, चारुदेष्ण, साम्ब, गद, कृतवर्मा, सारण, वीर निशठ और उल्मुक भी थे ।। ३ १/२ ।। बलदेवं पुरस्कृत्य सुभद्रासहितस्तदा ।। ४ ।। द्रौपदीमुत्तरां चैव पृथां चाप्यवलोककः । समाश्वासयितुं चापि क्षत्रिया निहतेश्वराः ।। ५ ।। वे बलदेवजीको आगे करके सुभद्राके साथ पधारे थे। उनके शुभागमनका उद्देश्य था द्रौपदी, उत्तरा और कुन्तीसे मिलना तथा जिनके पति मारे गये थे, उन सभी क्षत्राणियोंको आश्वासन देना—धीरज बँधाना ।। ४-५ ।। तानागतान् समीक्ष्यैव धृतराष्ट्रो महीपतिः । प्रत्यगृह्लाद् यथान्यायं विदुरश्च महामनाः ।। ६ ।। उनके आगमनका समाचार सुनते ही राजा धृतराष्ट्र और महामना विदुरजी खड़े हो गये और आगे बढ़कर उन्होंने उन सबका विधिवत् स्वागत-सत्कार किया ।। ६ ।। तत्रैव न्यवसत् कृष्णः स्वर्चितः पुरुषोत्तमः । विदुरेण महातेजास्तथैव च युयुत्सुना ।। ७ ।।