भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

विदुर और युयुत्सुसे भलीभाँति पूजित हो महातेजस्वी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण वहीं रहने लगे ॥ ७ ॥ वसत्सु वृष्णिवीरेषु तत्राथ जनमेजय । जज्ञे तव पिता राजन् परिक्षित् परवीरहा ॥ ८ ॥ जनमेजय! उन वृष्णिवीरोंके वहाँ निवास करते समय ही तुम्हारे पिता शत्रुवीरहन्ता परीक्षित्का जन्म हुआ था ॥ ८ ॥ स तु राजा महाराज ब्रह्मास्त्रेणावपीडितः । शवो बभूव निश्चेष्टो हर्षशोकविवर्धनः ॥ ९ ॥ महाराज! वे राजा परीक्षित् ब्रह्मास्त्रसे पीड़ित होनेके कारण चेष्टाहीन मुर्देके रूपमें उत्पन्न हुए, अतः स्वजनोंका हर्ष और शोक बढ़ानेवाले हो गये थे* ॥ ९ ॥ हृष्टानां सिंहनादेन जनानां तत्र निःस्वनः । प्रविश्य प्रदिशः सर्वाः पुनरेव व्युपरमत् ॥ १० ॥ पहले पुत्र-जन्मका समाचार सुनकर हर्षमें भरे हुए लोगोंके सिंहनादसे एक महान् कोलाहल सुनायी पड़ा, जो सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रविष्ट हो पुनः शान्त हो गया ॥ १० ॥ ततः सोऽतित्वरः कृष्णो विवेशान्तःपुरं तदा । युयुधानद्वितीयो वै व्यथितेन्द्रियमानसः ॥ ११ ॥ इससे भगवान् श्रीकृष्णके मन और इन्द्रियोंमें व्यथा-सी उत्पन्न हो गयी। वे सात्यकिको साथ ले बड़ी उतावलीसे अन्तःपुरमें जा पहुँचे ॥ ११ ॥ ततस्त्वरितमायान्तीं ददर्श स्वां पितृष्वसाम् । क्रोशन्तीमभिधावेति वासुदेवं पुनः पुनः ॥ १२ ॥ वहाँ उन्होंने अपनी बुआ कुन्तीको बड़े वेगसे आती देखा, जो बारंबार उन्हींका नाम लेकर 'वासुदेव! दौड़ो-दौड़ो' की पुकार मचा रही थी ॥ १२ ॥ पृष्ठतो द्रौपदीं चैव सुभद्रां च यशस्विनीम् । सविक्रोशं सकरुणं बान्धवानां स्त्रियो नृप ॥ १३ ॥ राजन्! उनके पीछे द्रौपदी, यशस्विनी सुभद्रा तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंकी स्त्रियाँ भी थीं, जो बड़े करुण स्वरसे बिलख-बिलखकर रो रही थीं ॥ १३ ॥ ततः कृष्णं समासाद्य कुन्तिभोजसुता तदा । प्रोवाच राजशार्दूल बाष्पगद्गदया गिरा ॥ १४ ॥ नृपश्रेष्ठ! उस समय श्रीकृष्णके निकट पहुँचकर कुन्तिभोजकुमारी कुन्ती नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई गद्गद वाणीमें बोली— ॥ १४ ॥ वासुदेव महाबाहो सुप्रजा देवकी त्वया । त्वं नो गतिः प्रतिष्ठा च त्वदायत्तमिदं कुलम् ॥ १५ ॥