अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तषष्टितमोऽध्यायः
परीक्षित्को जिलानेके लिये सुभद्राकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना
वैशम्पायन उवाच उत्थितायां पृथायां तु सुभद्रा भ्रातरं तदा । दृष्ट्वा चुक्रोश दुःखार्ता वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुन्तीदेवीके बैठ जानेपर सुभद्रा अपने भाई श्रीकृष्णकी ओर देखकर फूट-फूटकर रोने लगी और दुःखसे आर्त होकर यों बोली —॥ १ ॥ पुण्डरीकाक्ष पश्य त्वं पौत्रं पार्थस्य धीमतः । परिक्षीनेषु कुरुषु परिक्षीणं गतायुषम् ॥ २ ॥ 'भैया कमलनयन! तुम अपने सखा बुद्धिमान् पार्थके इस पौत्रकी दशा तो देखो। कौरवोंके नष्ट हो जानेपर इसका जन्म हुआ; परंतु यह भी गतायु होकर नष्ट हो गया ॥ २ ॥ इषीका द्रोणपुत्रेण भीमसेनार्थमुद्यता । सोत्तरायां निपतिता विजये मयि चैव ह ॥ ३ ॥ 'द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने भीमसेनको मारनेके लिये जो सींकका बाण उठाया था, वह उत्तरापर, तुम्हारे सखा विजयपर और मुझपर गिरा है ॥ ३ ॥ सेयं विदीर्णे हृदये मयि तिष्ठति केशव । यन्न पश्यामि दुर्धर्ष सहपुत्रं तु तं प्रभो ॥ ४ ॥ 'दुर्धर्ष वीर केशव! प्रभो! वह सींक मेरे इस विदीर्ण हुए हृदयमें आज भी कसक रही है; क्योंकि इस समय मैं पुत्रसहित अभिमन्युको नहीं देख पाती हूँ ॥ ४ ॥ किं नु वक्ष्यति धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिरः । भीमसेनार्जुनौ चापि माद्रवत्याः सुतौ च तौ ॥ ५ ॥ श्रुत्वाभिमन्योस्तनयं जातं च मृतमेव च । मुषिता इव वार्ष्णेय द्रोणपुत्रेण पाण्डवाः ॥ ६ ॥ 'अभिमन्युका बेटा जन्म लेनेके साथ ही मर गया—इस बातको सुनकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर क्या कहेंगे? भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीकुमार नकुल-सहदेव भी क्या सोचेंगे? श्रीकृष्ण! आज द्रोणपुत्रने पाण्डवोंका सर्वस्व लूट लिया ॥ ५-६ ॥ अभिमन्युः प्रियः कृष्ण भ्रातृणां नात्र संशयः । ते श्रुत्वा किं नु वक्ष्यन्ति द्रोणपुत्रास्त्रनिर्जिताः ॥ ७ ॥