अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘श्रीकृष्ण! अभिमन्यु पाँचों भाइयोंको अत्यन्त प्रिय था—इसमें संशय नहीं है। उसके पुत्रकी यह दशा सुनकर अश्वत्थामाके अस्त्रसे पराजित हुए पाण्डव क्या कहेंगे? ।। ७ ।। भवेतातः परं दुःखं किं तदन्यज्जनार्दन । अभिमन्योः सुतात् कृष्ण मृताज्जातादरिंदम ।। ८ ।। ‘शत्रुसूदन! जनार्दन! श्रीकृष्ण! अभिमन्यु-जैसे वीरका पुत्र मरा हुआ पैदा हो, इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है? ।। ८ ।। साहं प्रसादये कृष्ण त्वामद्य शिरसा नता । पृथेयं द्रौपदी चैव ताः पश्य पुरुषोत्तम ।। ९ ।। ‘पुरुषोत्तम! श्रीकृष्ण! आज मैं तुम्हारे चरणोंपर मस्तक रखकर तुम्हें प्रसन्न करना चाहती हूँ। बूआ कुन्ती और बहिन द्रौपदी भी तुम्हारे पैरोंपर पड़ी हुई हैं। इन सबकी ओर देखो ।। ९ ।। यदा द्रोणसुतो गर्भान् पाण्डूनां हन्ति माधव । तदा किल त्वया द्रौणिः क्रुद्धेनोक्तोऽरिमर्दन ।। १० ।। ‘शत्रुमर्दन माधव! जब द्रोणपुत्र अश्वत्थामा पाण्डवोंके गर्भकी भी हत्या करनेका प्रयत्न कर रहा था, उस समय तुमने कुपित होकर उससे कहा था ।। १० ।। अकामं त्वां करिष्यामि ब्रह्मबन्धो नराधम । अहं संजीवयिष्यामि किरीटितनयात्मजम् ।। ११ ।। ‘ब्रह्मबन्धो! नराधम! मैं तेरी इच्छा पूर्ण नहीं होने दूँगा। अर्जुनके पौत्रको अपने प्रभावसे जीवित कर दूँगा ।। ११ ।। इत्येतद् वचनं श्रुत्वा जानानाहं बलं तव । प्रसादये त्वां दुर्धर्ष जीवतामभिमन्युजः ।। १२ ।। ‘भैया! तुम दुर्धर्ष वीर हो। मैं तुम्हारी उस बातको सुनकर तुम्हारे बलको अच्छी तरह जानती हूँ। इसीलिये तुम्हें प्रसन्न करना चाहती हूँ। तुम्हारे कृपा-प्रसादसे अभिमन्युका यह पुत्र जीवित हो जाय ।। १२ ।। यद्येतत् त्वं प्रतिश्रुत्य न करोषि वचः शुभम् । सकलं वृष्णिशार्दूल मृतां मामवधारय ।। १३ ।। ‘वृष्णिवंशके सिंह! यदि तुम ऐसी प्रतिज्ञा करके अपने मंगलमय वचनका पूर्णतः पालन नहीं करोगे तो यह समझ लो, सुभद्रा जीवित नहीं रहेगी—मैं अपने प्राण दे दूँगी ।। १३ ।। अभिमन्योः सुतो वीर न संजीवति यद्ययम् । जीवति त्वयि दुर्धर्ष किं करिष्याम्यहं त्वया ।। १४ ।। ‘दुर्धर्ष वीर! यदि तुम्हारे जीते-जी अभिमन्युके इस बालकको जीवनदान न मिला तो तुम मेरे किस काम आओगे ।। १४ ।।