अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 277, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनसप्ततितमोऽध्यायः उत्तराका विलाप और भगवान् श्रीकृष्णका उसके मृत बालकको जीवन-दान देना वैशम्पायन उवाच सैवं विलप्य करुणं सोन्मादेव तपस्विनी । उत्तरा न्यपतद् भूमौ कृपणा पुत्रगृद्धिनी ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पुत्रका जीवन चाहनेवाली तपस्विनी उत्तरा उन्मादिनी-सी होकर इस प्रकार दीनभावसे करुण विलाप करके पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ १ ॥ तां तु दृष्ट्वा निपतितां हतपुत्रपरिच्छदाम् । चुक्रोश कुन्ती दुःखार्ता सर्वाश्च भरतस्त्रियः ॥ २ ॥ जिसका पुत्ररूपी परिवार नष्ट हो गया था, उस उत्तराको पृथ्वीपर पड़ी हुई देख दुःखसे आतुर हुई कुन्तीदेवी तथा भरतवंशकी सारी स्त्रियाँ फूट-फूटकर रोने लगीं ॥ २ ॥ मुहूर्तमिव राजेन्द्र पाण्डवानां निवेशनम् । अप्रेक्षणीयमभवदार्तस्वनविनादितम् ॥ ३ ॥ राजेन्द्र! दो घड़ीतक पाण्डवोंका वह भवन आर्तनादसे गूँजता रहा। उस समय उसकी ओर देखते नहीं बनता था ॥ ३ ॥ सा मुहूर्तं च राजेन्द्र पुत्रशोकाभिपीडिता । कश्मलाभिहता वीर वैराटी त्वभवत् तदा ॥ ४ ॥ वीर राजेन्द्र! पुत्रशोकसे पीड़ित वह विराटकुमारी उत्तरा उस समय दो घड़ीतक मूर्च्छामें पड़ी रही ॥ ४ ॥ प्रतिलभ्य तु सा संज्ञांमुत्तरा भरतर्षभ । अङ्कमारोप्य तं पुत्रमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥ भरतश्रेष्ठ! थोड़ी देर बाद उत्तरा जब होशमें आयी, तब उस मरे हुए पुत्रको गोदमें लेकर यों कहने लगी— ॥ ५ ॥ धर्मज्ञस्य सुतः स त्वमधर्मं नावबुध्यसे । यस्त्वं वृष्णिप्रवीरस्य कुरुषे नाभिवादनम् ॥ ६ ॥ 'बेटा! तू तो धर्मज्ञ पिताका पुत्र है। फिर तेरे द्वारा जो अधर्म हो रहा है, उसे तू क्यों नहीं समझता? वृष्णिवंशके श्रेष्ठ वीर भगवान् श्रीकृष्ण सामने खड़े हैं तो भी तू इन्हें प्रणाम क्यों नहीं करता? ॥ ६ ॥ पुत्र गत्वा मम वचो ब्रूयास्त्वं पितरं त्विदम् ।