भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

दुर्मरं प्राणिनां वीर कालेऽप्राप्ते कथंचन ।। ७ ।। याहं त्वया विनाद्येह पत्या पुत्रेण चैव ह । मर्त्तव्ये सति जीवामि हतस्वस्तिरकिंचना ।। ८ ।। ‘वत्स! परलोकमें जाकर तू अपने पितासे मेरी यह बात कहना—‘वीर! अन्तकाल आये बिना प्राणियोंके लिये किसी तरह भी मरना बड़ा कठिन होता है। तभी तो मैं यहाँ आप-जैसे पति तथा इस पुत्रसे बिछुड़कर भी जब कि मुझे मर जाना चाहिये, अबतक जी रही हूँ; मेरा सारा मंगल नष्ट हो गया है। मैं अकिंचन हो गयी हूँ’ ।। अथवा धर्मराज्ञाहमनुज्ञाता महाभुज । भक्षयिष्ये विषं घोरं प्रवेक्ष्ये वा हुताशनम् ।। ९ ।। ‘महाबाहो! अब मैं धर्मराजकी आज्ञा लेकर भयानक विष खा लूँगी अथवा प्रज्वलित अग्निमें समा जाऊँगी ।। ९ ।। अथवा दुर्मरं तात यदिदं मे सहस्रधा । पतिपुत्रविहीनाया हृदयं न विदीर्यते ।। १० ।। ‘तात! जान पड़ता है, मनुष्यके लिये मरना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि पति और पुत्रसे हीन होनेपर भी मेरे इस हृदयके हजारों टुकड़े नहीं हो रहे हैं ।। १० ।। उत्तिष्ठ पुत्र पश्येमं दुःखितां प्रपितामहीम् । आर्त्तामुपप्लुतां दीनां निमग्नां शोकसागरे ।। ११ ।। ‘बेटा! उठकर खड़ा हो जा। देख! ये तेरी परदादी (कुन्ती) कितनी दुखी हैं। ये तेरे लिये आर्त, व्यथित एवं दीन होकर शोकके समुद्रमें डूब गयी हैं ।। ११ ।। आर्यां च पश्य पाञ्चालीं सात्वतीं च तपस्विनीम् । मां च पश्य सुदुःखार्त्ता व्याधविद्धां मृगीमिव ।। १२ ।। ‘आर्या पांचाली (द्रौपदी)-की ओर देख, अपनी दादी तपस्विनी सुभद्राकी ओर दृष्टिपात कर और व्याधके बाणोंसे बिंधी हुई हरिणीकी भाँति अत्यन्त दुःखसे आर्त हुई मुझ अपनी माँको भी देख ले ।। १२ ।। उत्तिष्ठ पश्य वदनं लोकनाथस्य धीमतः । पुण्डरीकपलाशाक्षं पुरेव चपलेक्षणम् ।। १३ ।। ‘बेटा! उठकर खड़ा हो जा और बुद्धिमान् जगदीश्वर श्रीकृष्णके कमलदलके समान नेत्रोंवाले मुखारविन्दकी शोभा निहार, ठीक उसी तरह जैसे पहले मैं चंचल नेत्रोंवाले तेरे पिताका मुँह निहारा करती थी’ ।। १३ ।। एवं विप्रलपन्तीं तु दृष्ट्वा निपतितां पुनः । उत्तरां तां स्त्रियं सर्वाः पुनरुत्थापयंस्ततः ।। १४ ।। इस प्रकार विलाप करती हुई उत्तराको पुनः पृथ्वीपर पड़ी देख सब स्त्रियोंने उसे फिर उठाकर बिठाया ।। १४ ।।