भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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सप्ततितमोऽध्यायः श्रीकृष्णद्वारा राजा परिक्षित्का नामकरण तथा पाण्डवोंका हस्तिनापुरके समीप आगमन वैशम्पायन उवाच ब्रह्मास्त्रं तु यदा राजन् कृष्णेन प्रतिसंहृतम् । तदा तद् वेश्म त्वत्पित्रा तेजसाभिविदीपितम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! भगवान् श्रीकृष्णने जब ब्रह्मास्त्रको शान्त कर दिया, उस समय वह सूतिकागृह तुम्हारे पिताके तेजसे देदीप्यमान होने लगा ॥ १ ॥ ततो रक्षांसि सर्वाणि नेशुस्त्यक्त्वा गृहं तु तत् । अन्तरिक्षे च वागासीत् साधु केशव साध्विति ॥ २ ॥ फिर तो बालकोंका विनाश करनेवाले समस्त राक्षस उस घरको छोड़कर भाग गये। इसी समय आकाशवाणी हुई—'केशव! तुम्हें साधुवाद! तुमने बहुत अच्छा कार्य किया' ॥ २ ॥ तदस्त्रं ज्वलितं चापि पितामहमगात् तदा । ततः प्राणान् पुनर्लेभे पिता तव नरेश्वर ॥ ३ ॥ साथ ही वह प्रज्वलित ब्रह्मास्त्र ब्रह्मलोकको चला गया। नरेश्वर! इस तरह तुम्हारे पिताको पुनर्जीवन प्राप्त हुआ ॥ ३ ॥ व्यचेष्टत च बालोऽसौ यथोत्साहं यथाबलम् । बभूवुर्मुदिता राजंस्ततस्ता भरतस्त्रियः ॥ ४ ॥ राजन्! उत्तराका वह बालक अपने उत्साह और बलके अनुसार हाथ-पैर हिलाने लगा, यह देख भरतवंशकी उन सभी स्त्रियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४ ॥ ब्राह्मणान् वाचयामासुर्गोविन्दस्यैव शासनात् । ततस्ता मुदिताः सर्वाः प्रशंसुर्जनार्दनम् ॥ ५ ॥ उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराया। फिर वे सब आनन्दमग्न होकर श्रीकृष्णके गुण गाने लगीं ॥ ५ ॥ स्त्रियो भरतसिंहानां नावं लब्ध्वेव पारगाः । कुन्ती द्रुपदपुत्री च सुभद्रा चोत्तरा तथा ॥ ६ ॥ स्त्रियश्चान्या नृसिंहानां बभूवुर्हृष्टमानसाः ।