भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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आये ॥ १० ॥ ततः शब्दो महाराज दिशः खं प्रति पूरयन् । बभूव प्रेक्षतां नृणां कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ॥ ११ ॥ महाराज! उस समय कुन्तीपुत्र धनंजयका दर्शन करनेवाले लोगोंके मुखसे जो शब्द निकलता था, वह सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशमें गूँज रहा था ॥ ११ ॥ एष गच्छति कौन्तेय तुरगश्चैव दीप्तिमान् । यमन्वेति महाबाहुः संस्पृशन् धनुरुत्तमम् ॥ १२ ॥ (लोग कहते थे—) 'ये कुन्तीकुमार अर्जुन जा रहे हैं और वह दीप्तिमान् अश्व जा रहा है, जिसके पीछे महाबाहु अर्जुन उत्तम धनुष धारण किये जा रहे हैं' ॥ १२ ॥ एवं शुश्राव वदतां गिरो जिष्णुरुदारधीः । स्वस्ति तेऽस्तु व्रजारिष्टं पुनश्चैहीति भारत ॥ १३ ॥ उदारबुद्धि अर्जुनने परस्पर वार्तालाप करते हुए लोगोंकी बातें इस प्रकार सुनीं —'भारत! तुम्हारा कल्याण हो। तुम सुखसे जाओ और पुनः कुशलपूर्वक लौट आओ' ॥ १३ ॥ अथापरे मनुष्येन्द्र पुरुषा वाक्यमब्रुवन् । नैनं पश्याम सम्मर्दे धनुरेतत् प्रदृश्यते ॥ १४ ॥ एतद्धि भीमनिर्ह्रादं विश्रुतं गाण्डिवं धनुः । स्वस्ति गच्छत्वरिष्टो वै पन्थानमकुतोभयम् ॥ १५ ॥ निवृत्तमेनं द्रक्ष्यामः पुनरेष्यति च ध्रुवम् । नरेन्द्र! दूसरे लोग ये बातें कहते थे—'इस भीड़में हम अर्जुनको तो नहीं देखते हैं; किंतु उनका यह धनुष दिखायी देता है। यही वह भयंकर टंकार करनेवाला विख्यात गाण्डीव धनुष है। अर्जुनकी यात्रा सकुशल हो। उन्हें मार्गमें कोई कष्ट न हो। ये निर्भय मार्गपर आगे बढ़ते रहें। ये निश्चय ही कुशलपूर्वक लौटेंगे और उस समय हम फिर इनका दर्शन करेंगे' ॥ १४-१५ १/२ ॥ एवमाद्या मनुष्याणां स्त्रीणां च भरतर्षभ ॥ १६ ॥ शुश्राव मधुरा वाचः पुनः पुनरुदारधीः । भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उदारबुद्धि अर्जुन स्त्रियों और पुरुषोंकी कही हुई मीठी-मीठी बातें बारंबार सुनते थे ॥ १६ १/२ ॥ याज्ञवल्क्यस्य शिष्यश्च कुशलो यज्ञकर्मणि ॥ १७ ॥ प्रायात् पार्थेन सहितः शान्त्यर्थं वेदपारगः । याज्ञवल्क्य मुनिके एक विद्वान् शिष्य, जो यज्ञकर्ममें कुशल तथा वेदोंमें पारंगत थे, विघ्नकी शान्तिके लिये अर्जुनके साथ गये ॥ १७ १/२ ॥ ब्राह्मणाश्च महीपाल बहवो वेदपारगाः ॥ १८ ॥