अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 298, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुजग्मुर्महात्मानं क्षत्रियाश्च विशाम्पते । विधिवत् पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात् ॥ १९ ॥ महाराज! प्रजानाथ! उनके सिवा और भी बहुत-से वेदोंमें पारंगत ब्राह्मणों और क्षत्रियोंने धर्मराजकी आज्ञासे विधिपूर्वक महात्मा अर्जुनका अनुसरण किया ॥ १८-१९ ॥ पाण्डवैः पृथिवीमश्वो निर्जितामस्त्रतेजसा । चचार स महाराज यथादेशं च सत्तम ॥ २० ॥ महाराज! साधुशिरोमणे! पाण्डवोंने अपने अस्त्रके प्रतापसे जिस पृथ्वीको जीता था, उसके सभी देशोंमें वह अश्व क्रमशः विचरण करने लगा ॥ २० ॥ तत्र युद्धानि वृत्तानि यान्यासन् पाण्डवस्य ह । तानि वक्ष्यामि ते वीर विचित्राणि महान्ति च ॥ २१ ॥ वीर! उन देशोंमें अर्जुनको जो बड़े-बड़े अद्भुत युद्ध करने पड़े, उनकी कथा तुम्हें सुना रहा हूँ ॥ २१ ॥ स हयः पृथिवीं राजन् प्रदक्षिणमवर्तत । ससारोत्तरतः पूर्वं तन्निबोध महीपते ॥ २२ ॥ अवमृद्नन् स राष्ट्राणि पार्थिवानां हयोत्तमः । शनैस्तदा परिययौ श्वेताश्वश्च महारथः ॥ २३ ॥ पृथिवीनाथ! वह घोड़ा पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करने लगा। सबसे पहले वह उत्तर दिशाकी ओर गया। फिर राजाओंके अनेक राज्योंको रौंदता हुआ वह उत्तम अश्व पूर्वकी ओर मुड़ गया। उस समय श्वेतवाहन महारथी अर्जुन धीरे-धीरे उसके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥ तत्र संगणना नास्ति राज्ञामयुतशस्तदा । येऽयुध्यन्त महाराज क्षत्रिया हतबान्धवाः ॥ २४ ॥ महाराज! महाभारत-युद्धमें जिनके भाई-बन्धु मारे गये थे, ऐसे जिन-जिन क्षत्रियोंने उस समय अर्जुनके साथ युद्ध किया था, उन हजारों नरेशोंकी कोई गिनती नहीं है ॥ २४ ॥ किराता यवना राजन् बहवोऽसिधनुर्धराः । म्लेच्छाश्चान्ये बहुविधाः पूर्वं ये निकृता रणे ॥ २५ ॥ राजन्! तलवार और धनुष धारण करनेवाले बहुत-से किरात, यवन और म्लेच्छ, जो पहले महाभारत-युद्धमें पाण्डवोंद्वारा परास्त किये गये थे, अर्जुनका सामना करनेके लिये आये ॥ २५ ॥ आर्याश्च पृथिवीपालाः प्रहृष्टनरवाहनाः । समीयुः पाण्डुपुत्रेण बहवो युद्धदुर्मदाः ॥ २६ ॥ हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों और वाहनोंसे युक्त बहुत-से रणदुर्मद आर्य नरेश भी पाण्डुपुत्र अर्जुनसे भिड़े थे ।। एवं वृत्तानि युद्धानि तत्र तत्र महीपते ।