अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअलातचक्रवद् राजन् शरजालैः समर्पयत् ॥ ३० ॥ राजन्! उस समय महाबली पुरुषसिंह अर्जुन अलातचक्रकी भाँति घूम-घूमकर सारे सैन्धवोंपर बाण-समूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३० ॥ तदिन्द्रजालप्रतिमं बाणजालममित्रहा । विसृज्य दिक्षु सर्वासु महेन्द्र इव वज्रभृत् ॥ ३१ ॥ शत्रुसूदन अर्जुनने वज्रधारी महेन्द्रकी भाँति सम्पूर्ण दिशाओंसे इन्द्रजालके समान बाणोंका जाल-सा फैला दिया ॥ ३१ ॥ मेघजालनिभं सैन्यं विदार्य शरवृष्टिभिः । विबभौ कौरवश्रेष्ठः शरदीव दिवाकरः ॥ ३२ ॥ जैसे शरत्कालके सूर्य मेघोंकी घटाको छिन्न-भिन्न करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार कौरवश्रेष्ठ अर्जुन अपने बाणोंकी वृष्टिसे शत्रुसेनाको विदीर्ण करके अत्यन्त शोभा पाने लगे ॥ ३२ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवयुद्धे सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सैन्धवोंके साथ अर्जुनका युद्धविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं)