भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 421 में से

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अष्टसप्ततितमोऽध्यायः अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दुःशलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति वैशम्पायन उवाच ततो गाण्डीवभृच्छूरो युद्धाय समुपस्थितः । विबभौ युधि दुर्धर्षो हिमवानचलो यथा ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुन युद्धके लिये उद्यत हो गये। वे शत्रुओंके लिये दुर्जय थे और युद्धभूमिमें हिमवान् पर्वतके समान अचल भावसे डटे रहकर बड़ी शोभा पाने लगे ॥ १ ॥ ततस्ते सैन्धवा योधाः पुनरेव व्यवस्थिताः । व्यमुञ्चन्त सुसंरब्धा शरवर्षाणि भारत ॥ २ ॥ भरतनन्दन! तदनन्तर सिन्धुदेशीय योद्धा फिरसे संगठित होकर खड़े हो गये और अत्यन्त क्रोधमें भरकर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २ ॥ तान् प्रहस्य महाबाहुः पुनरेव व्यवस्थितान् । ततः प्रोवाच कौन्तेयो मुमूर्षून् श्लक्ष्णया गिरा । युध्यध्वं परया शक्त्या यतध्वं विजये मम ॥ ३ ॥ उस समय महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुन पुनः मरनेकी इच्छासे खड़े हुए सैन्धवोंको सम्बोधित करके हँसते हुए मधुर वाणीमें बोले—'वीरो! तुम पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करो और मुझपर विजय पानेका प्रयत्न करते रहो ॥ ३ ॥ कुरुध्वं सर्वकार्याणि महद् वो भयमागतम् । एष योत्स्यामि सर्वांस्तु निवार्य शरवागुराम् ॥ ४ ॥ 'तुम अपने सारे कार्य पूरे कर लो। तुमलोगोंपर महान् भय आ पहुँचा है। यह देखो—मैं तुम्हारे बाणोंका जाल छिन्न-भिन्न करके तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करनेको उद्यत हूँ ॥ ४ ॥ तिष्ठध्वं युद्धमनसो दर्पं शमयितास्मि वः । एतावदुक्त्वा कौरव्यो रोषाद् गाण्डीवभृत् तदा ॥ ५ ॥ ततोऽथ वचनं स्मृत्वा भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भारत । न हन्तव्या रणे तात क्षत्रिया विजिगीषवः ॥ ६ ॥ जेतव्याश्चेति यत् प्रोक्तं धर्मराज्ञा महात्मना । चिन्तयामास स तदा फाल्गुनः पुरुषर्षभः ॥ ७ ॥

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