अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपीछे-पीछे युद्धके लिये यहाँतक आ पहुँचे हो तो वह पिताकी मृत्युके दुःखसे आतुर हो अपने प्राणोंका परित्याग कर बैठा है ॥ २९-३० ॥ प्राप्तो बीभत्सुरित्येव नाम श्रुत्वैव तेऽनघ । विषादार्तः पपातोर्व्यां ममार च ममात्मजः ॥ ३१ ॥ ‘अनघ! ‘अर्जुन आये’ इन शब्दोंके साथ तुम्हारा नाममात्र सुनकर ही मेरा बेटा विषादसे पीड़ित हो पृथ्वीपर गिरा और मर गया ॥ ३१ ॥ तं दृष्ट्वा पतितं तत्र ततस्तस्यात्मजं प्रभो । गृहीत्वा समनुप्राप्ता त्वामद्य शरणैषिणी ॥ ३२ ॥ ‘प्रभो! उसको ऐसी अवस्थामें पड़ा हुआ देख उसके पुत्रको साथ ले मैं शरण खोजती हुई आज तुम्हारे पास आयी हूँ’ ॥ ३२ ॥ इत्युक्त्वाऽऽर्तस्वरं सा तु मुमोच धृतराष्ट्रजा । दीना दीनं स्थितं पार्थमब्रवीच्चाप्यधोमुखम् ॥ ३३ ॥ ऐसा कहकर धृतराष्ट्र-पुत्री दुःशला दीन होकर आर्तस्वरसे विलाप करने लगी। उसकी दीनदशा देख अर्जुन भी दीन भावसे अपना मुँह नीचे किये खड़े रहे। उस समय दुःशला उनसे फिर बोली— ॥ ३३ ॥ स्वसारं समवेक्षस्व स्वस्त्रीयात्मजमेव च । कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ दयां कुरु कुलोद्वह ॥ ३४ ॥ ‘भैया! तुम कुरुकुलमें श्रेष्ठ और धर्मको जाननेवाले हो, अतः दया करो। अपनी इस दुखिया बहिनकी ओर देखो और भानजेके बेटेपर भी कृपादृष्टि करो ॥ ३४ ॥ विस्मृत्य कुरुराजानं तं च मन्दं जयद्रथम् । अभिमन्योर्यथा जातः परिक्षित् परवीरहा ॥ ३५ ॥ तथायं सुरथाज्जातो मम पौत्रो महाभुजः । ‘मन्दबुद्धि दुर्योधन और जयद्रथको भूलकर हमें अपनाओ। जैसे अभिमन्युसे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले परीक्षित्का जन्म हुआ है, उसी प्रकार सुरथसे यह मेरा महाबाहु पौत्र उत्पन्न हुआ है ॥ ३५ १/२ ॥ तमादाय नरव्याघ्र सम्प्राप्तास्मि तवान्तिकम् ॥ ३६ ॥ शमार्थं सर्वयोधानां शृणु चेदं वचो मम । ‘पुरुषसिंह! मैं इसीको लेकर समस्त योद्धाओंको शान्त करनेके लिये आज तुम्हारे पास आयी हूँ। तुम मेरी यह बात सुनो ॥ ३६ १/२ ॥ आगतोऽयं महाबाहो तस्य मन्दस्य पुत्रकः ॥ ३७ ॥ प्रसादमस्य बालस्य तस्मात् त्वं कर्तुमर्हसि । ‘महाबाहो! यह उस मन्दबुद्धि जयद्रथका पौत्र तुम्हारी शरणमें आया है। अतः इस बालकपर तुम्हें कृपा करनी चाहिये ॥ ३७ १/२ ॥