भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 327

प्रययौ पार्थमुद्दिश्य स राजा बभ्रुवाहनः ॥ १६ ॥ उस रथमें सब प्रकारकी युद्ध-सामग्री सजाकर रखी गयी थी। मनके समान वेगशाली घोड़े जुते हुए थे। चक्र और अन्य आवश्यक सामान भी प्रस्तुत थे। सोनेके भाण्ड उसकी शोभा बढ़ाते थे। सुवर्णसे ही उस रथका निर्माण हुआ था। उसपर सिंहके चिह्नवाली ऊँची ध्वजा फहरा रही थी। उस परम पूजित उत्तम रथपर सवार हो श्रीमान् राजा बभ्रुवाहन अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा ॥ १५-१६ ॥ ततोऽभ्येत्य हयं वीरो यज्ञियं पार्थरक्षितम् । ग्राहयामास पुरुषैर्हयशिक्षाविशारदैः ॥ १७ ॥ पार्थद्वारा सुरक्षित उस यज्ञसम्बन्धी अश्वके पास जाकर उस वीरने अश्वशिक्षाविशारद पुरुषोंद्वारा उसे पकड़वा लिया ॥ १७ ॥ गृहीतं वाजिनं दृष्ट्वा प्रीतात्मा स धनंजयः । पुत्रं रथस्थं भूमिष्ठः संन्यवारयदाहवे ॥ १८ ॥ घोड़ेको पकड़ा गया देख अर्जुन मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। यद्यपि वे भूमिपर खड़े थे तो भी रथपर बैठे हुए अपने पुत्रको युद्धके मैदानमें आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ १८ ॥ स तत्र राजा तं वीरं शरसंघैरनेकंशः । अर्दयामास निशितैराशीविषविषोपमैः ॥ १९ ॥ राजा बभ्रुवाहनने वहाँ अपने वीर पिताको विषैले साँपोंके समान जहरीले और तेज किये हुए सैकड़ों बाण-समूहोंद्वारा बींधकर अनेक बार पीड़ित किया ॥ १९ ॥ तयोः समभवद् युद्धं पितुः पुत्रस्य चातुलम् । देवासुररणप्रख्यमुभयोः प्रीयमाणयोः ॥ २० ॥ वे पिता और पुत्र दोनों प्रसन्न होकर लड़ रहे थे। उन दोनोंका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर जान पड़ता था। उसकी इस जगत्में कहीं भी तुलना नहीं थी ॥ २० ॥ किरीटिनं प्रविव्याध शरेणानतपर्वणा । जत्रुदेशे नरव्याघ्रं प्रहसन् बभ्रुवाहनः ॥ २१ ॥ बभ्रुवाहनने हँसते-हँसते पुरुषसिंह अर्जुनके गलेकी हँसलीमें झुकी हुई गाँठवाले एक बाणद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ २१ ॥ सोऽभ्यगात् सह पुङ्खेन वल्मीकमिव पन्नगः । विनिर्भिद्य च कौन्तेयं प्रविवेश महीतलम् ॥ २२ ॥ जैसे साँप बाँबीमें घुस जाता है, उसी प्रकार वह बाण अर्जुनके शरीरमें पंखसहित घुस गया और उसे छेदकर पृथ्वीमें समा गया ॥ २२ ॥ स गाढवेदनो धीमानालम्ब्य धनुरुत्तमम् । दिव्यं तेजः समाविश्य प्रमीत इव सोऽभवत् ॥ २३ ॥