अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 328, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंइससे अर्जुनको बड़ी वेदना हुई। बुद्धिमान् अर्जुन अपने उत्तम धनुषका सहारा लेकर दिव्य तेजमें स्थित हो मुर्देके समान हो गये ॥ २३ ॥ स संज्ञामुपलभ्याथ प्रशस्य पुरुषर्षभः । पुत्रं शक्रात्मजो वाक्यमिदमाह महाद्युतिः ॥ २४ ॥ थोड़ी देर बाद होशमें आनेपर महातेजस्वी पुरुषप्रवर इन्द्रकुमार अर्जुनने अपने पुत्रकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा— ॥ २४ ॥ साधु साधु महाबाहो वत्स चित्राङ्गदात्मज । सदृशं कर्म ते दृष्ट्वा प्रीतिमानस्मि पुत्रक ॥ २५ ॥ 'महाबाहु चित्रांगदाकुमार! तुम्हें साधुवाद! वत्स! तुम धन्य हो। पुत्र! तुम्हारे योग्य पराक्रम देखकर मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ २५ ॥ विमुञ्चाम्येष ते बाणान् पुत्र युद्धे स्थिरो भव । इत्येवमुक्त्वा नाराचैरभ्यवर्षदमित्रहा ॥ २६ ॥ 'अच्छा बेटा! अब मैं तुमपर बाण छोड़ता हूँ। तुम सावधान एवं स्थिर हो जाओ।' ऐसा कहकर शत्रुसूदन अर्जुनने बभ्रुवाहनपर नाराचोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २६ ॥ तान् स गाण्डीवनिर्मुक्तान् वज्राशनिसमप्रभान् । नाराचानच्छिनद् राजा भल्लैः सर्वांस्त्रिधा द्विधा ॥ २७ ॥ परंतु राजा बभ्रुवाहनने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए वज्र और बिजलीके समान तेजस्वी उन समस्त नाराचोंको अपने भल्लोंद्वारा मारकर प्रत्येकके दो-दो, तीन-तीन टुकड़े कर दिये ॥ २७ ॥ तस्य पार्थः शरैर्दिव्यैर्ध्वजं हेमपरिष्कृतम् । सुवर्णतालप्रतिमं क्षुरेणापाहरद् रथात् ॥ २८ ॥ हयांश्चास्य महाकायान् महावेगानरिंदम । चकार राजन् निर्जीवान् प्रहसन्निव पाण्डवः ॥ २९ ॥ राजन्! तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने हँसते हुए-से अपने क्षुर नामक दिव्य बाणोंद्वारा बभ्रुवाहनके रथसे सुनहरे तालवृक्षके समान ऊँची सुवर्णभूषित ध्वजा काट गिरायी। शत्रुदमन नरेश! साथ ही उन्होंने उसके महान् वेगशाली विशालकाय घोड़ोंके भी प्राण ले लिये ॥ २८-२९ ॥ स रथादवतीर्याथ राजा परमकोपनः । पदातिः पितरं क्रुद्धो योधयामास पाण्डवम् ॥ ३० ॥ तब रथसे उतरकर परम क्रोधी राजा बभ्रुवाहन कुपित हो पैदल ही अपने पिता पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा ॥ ३० ॥ सम्प्रीयमाणः पार्थानामृषभः पुत्रविक्रमात् । नात्यर्थं पीडयामास पुत्रं वज्रधरात्मजः ॥ ३१ ॥