अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुन्तीपुत्रोंमें श्रेष्ठ इन्द्रकुमार अर्जुन अपने बेटेके पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हुए थे। इसलिये वे उसे अधिक पीड़ा नहीं देते थे ।। ३१ ।। स मन्यमानो विमुखं पितरं बभ्रुवाहनः । शरैराशीविषाकारैः पुनरेवार्दयद् बली ।। ३२ ।। बलवान् बभ्रुवाहन पिताको युद्धसे विरत मानकर विषधर सर्पोंके समान विषैले बाणोंद्वारा उन्हें पुनः पीड़ा देने लगा ।। ३२ ।। ततः स बाल्यात् पितरं विव्याध हृदि पत्रिणा । निशितेन सुपुङ्खेन बलवद् बभ्रुवाहनः ।। ३३ ।। उसने बालोचित अविवेकके कारण परिणामपर विचार किये बिना ही सुन्दर पाँखवाले एक तीखे बाणद्वारा पिताकी छातीमें एक गहरा आघात किया ।। ३३ ।। विवेश पाण्डवं राजन् मर्म भित्त्वातिदुःखकृत् । स तेनातिभृशं विद्धः पुत्रेण कुरुनन्दनः ।। ३४ ।। महीं जगाम मोहार्तस्ततो राजन् धनंजयः । राजन्! वह अत्यन्त दुःखदायी बाण पाण्डुपुत्र अर्जुनके मर्म-स्थलको विदीर्ण करके भीतर घुस गया। महाराज! पुत्रके चलाये हुए उस बाणसे अत्यन्त घायल होकर कुरुनन्दन अर्जुन मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े ।। तस्मिन् निपतिते वीरे कौरवाणां धुरंधरे ।। ३५ ।। सोऽपि मोहं जगामाथ ततश्चित्राङ्गदासुतः । कौरव-धुरंधर वीर अर्जुनके धराशायी होनेपर चित्रांगदाकुमार बभ्रुवाहन भी मूर्च्छित हो गया ।। ३५ १/२ ।। व्यायम्य संयुगे राजा दृष्ट्वा च पितरं हतम् ।। ३६ ।। पूर्वमेव स बाणौघैर्गाढविद्धोऽर्जुनेन ह । पपात सोऽपि धरणीमालिङ्ग्य रणमूर्धनि ।। ३७ ।। राजा बभ्रुवाहन युद्धस्थलमें बड़ा परिश्रम करके लड़ा था। वह भी अर्जुनके बाणसमूहोंद्वारा पहलेसे ही बहुत घायल हो चुका था। अतः पिताको मारा गया देख वह भी युद्धके मुहानेपर अचेत होकर गिर पड़ा और पृथ्वीका आलिंगन करने लगा ।। ३६-३७ ।। भर्तारं निहतं दृष्ट्वा पुत्रं च पतितं भुवि । चित्राङ्गदा परित्रस्ता प्रविवेश रणाजिरे ।। ३८ ।। पतिदेव मारे गये और पुत्र भी संज्ञाशून्य होकर पृथ्वीपर पड़ा है। यह देख चित्रांगदाने संतप्त हृदयसे समरांगणमें प्रवेश किया ।। ३८ ।। शोकसंतप्तहृदया रुदती वेपती भृशम् । मणिपूरपतेर्माता ददर्श निहतं पतिम् ।। ३९ ।।