अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘चौड़ी छाती और विशाल भुजावाले अपने पतिको मारा गया देखकर भी जो मेरी माता चित्रांगदा देवीका दृढ़ हृदय विदीर्ण नहीं हो जाता है। इससे मैं यह मानता हूँ कि अन्तकाल आये बिना मनुष्यका मरना बहुत कठिन है।। २३१२ ।। यत्र नाहं न मे माता विप्रयुज्येत जीवितात् ।। २४ ।। हा हा धिक् कुरुवीरस्य संनाहं काञ्चनं भुवि । अपविद्धं हतस्येह मया पुत्रेण पश्यत ।। २५ ।। ‘तभी तो इस संकटके समय भी मेरे और मेरी माताके प्राण नहीं निकलते। हाय! हाय! मुझे धिक्कार है, लोगों! देख लो! मुझ पुत्रके द्वारा मारे गये कुरुवीर अर्जुनका सुनहरा कवच यहाँ पृथ्वीपर फेंका पड़ा है’ ।। २४-२५ ।। भो भो पश्यत मे वीरं पितरं ब्राह्मणा भुवि । शयानं वीरशयने मया पुत्रेण पातितम् ।। २६ ।। ‘हे ब्राह्मणो! देखो, मुझ पुत्रके द्वारा मार गिराये गये मेरे वीर पिता अर्जुन वीरशय्यापर सो रहे हैं।। २६ ।। ब्राह्मणाः कुरुमुख्यस्य ये मुक्ता ह्यनुसारिणः । कुर्वन्ति शान्तिं कामस्य रणे योऽयं मया हतः ।। २७ ।। ‘कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके घोड़ेके पीछे-पीछे चलनेवाले जो ब्राह्मणलोग शान्तिकर्म करनेके लिये नियुक्त हुए हैं, वे इनके लिये कौन-सी शान्ति करते थे, जो ये रणभूमिमें मेरेद्वारा मार डाले गये! ।। २७ ।। व्यादिशन्तु च किं विप्राः प्रायश्चित्तमिहाद्य मे । सुनृशंसस्य पापस्य पितृहन्तू रणाजिरे ।। २८ ।। ‘ब्राह्मणो! मैं अत्यन्त क्रूर, पापी और समरांगणमें पिताकी हत्या करनेवाला हूँ। बताइये, मेरे लिये अब यहाँ कौन-सा प्रायश्चित्त है? ।। २८ ।। दुश्चरा द्वादशसमा हत्वा पितरमद्य वै । ममेह सुनृशंसस्य संवीतस्यास्य चर्मणा ।। २९ ।। शिरःकपाले चास्यैव युञ्जततः पितुरद्य मे । प्रायश्चित्तं हि नान्यन्यद्धत्वाद्य पितरं मम ।। ३० ।। ‘आज पिताकी हत्या करके मेरे लिये बारह वर्षोंतक कठोर व्रतका पालन करना अत्यन्त कठिन है। मुझ क्रूर पितृघातीके लिये यहाँ यही प्रायश्चित्त है कि मैं इन्हींके चमड़ेसे अपने शरीरको आच्छादित करके रहूँ और अपने पिताके मस्तक एवं कपालको धारण किये बारह वर्षोंतक विचरता रहूँ। पिताका वध करके अब मेरे लिये दूसरा कोई प्रायश्चित्त नहीं है ।। २९-३० ।। पश्य नागोत्तमसुते भर्तारं निहतं मया । कृतं प्रियं मया तेऽद्य निहत्य समरेऽर्जुनम् ।। ३१ ।।