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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 336

'नागराजकुमारी! देखो, युद्धमें मैंने तुम्हारे स्वामीका वध किया है। सम्भव है आज समरांगणमें इस तरह अर्जुनकी हत्या करके मैंने तुम्हारा प्रिय कार्य किया हो ।। ३१ ।। सोऽहमद्य गमिष्यामि गतिं पितृनिषेविताम्। न शक्नोम्यात्मनाऽऽत्मानमहं धारयितुं शुभे ।। ३२ ।। 'परंतु शुभे! अब मैं इस शरीरको धारण नहीं कर सकता। आज मैं भी उस मार्गपर जाऊँगा, जहाँ मेरे पिताजी गये हैं ।। ३२ ।। सा त्वं मयि मृते मातस्तथा गाण्डीवधन्वनि। भव प्रीतिमती देवि सत्येनात्मानमालभे ।। ३३ ।। 'मातः! देवि! मेरे तथा गाण्डीवधारी अर्जुनके मर जानेपर तुम भलीभाँति प्रसन्न होना। मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि पिताजीके बिना मेरा जीवन असम्भव है' ।। ३३ ।। इत्युक्त्वा स ततो राजा दुःखशोकसमाहतः। उपस्पृश्य महाराज दुःखार्द वचनमब्रवीत् ।। ३४ ।। महाराज! ऐसा कहकर दुःख और शोकसे पीड़ित हुए राजा बभ्रुवाहनने आचमन किया और बड़े दुःखसे इस प्रकार कहा— ।। ३४ ।। शृण्वन्तु सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च। त्वं च मातर्यथा सत्यं ब्रवीमि भुजगोत्तमे ।। ३५ ।। 'संसारके समस्त चराचर प्राणियो! आप मेरी बात सुनें। नागराजकुमारी माता उलूपी! तुम भी सुन लो। मैं सच्ची बात बता रहा हूँ ।। ३५ ।। यदि नोत्तिष्ठति जयः पिता मे नरसत्तमः। अस्मिन्नेव रणोद्देशे शोषयिष्ये कलेवरम् ।। ३६ ।। 'यदि मेरे पिता नरश्रेष्ठ अर्जुन आज जीवित हो पुनः उठकर खड़े नहीं हो जाते तो मैं इस रणभूमिमें ही उपवास करके अपने शरीरको सुखा डालूँगा ।। ३६ ।। न हि मे पितरं हत्वा निष्कृतिर्विद्यते क्वचित्। नरकं प्रतिपत्स्यामि ध्रुवं गुरुवधार्दितः ।। ३७ ।। 'पिताकी हत्या करके मेरे लिये कहीं कोई उद्धारका उपाय नहीं है। गुरुजन (पिता)-के वधरूपी पापसे पीड़ित हो मैं निश्चय ही नरकमें पडूँगा' ।। ३७ ।। वीरं हि क्षत्रियं हत्वा गोशतेन प्रमुच्यते। पितरं तु निहत्यैवं दुर्लभा निष्कृतिर्मम ।। ३८ ।। 'किसी एक वीर क्षत्रियका वध करके विजेता वीर सौ गोदान करनेसे उस पापसे छुटकारा पाता है; परंतु पिताकी हत्या करके इस प्रकार उस पापसे छुटकारा मिल जाय, यह मेरे लिये सर्वथा दुर्लभ है ।। ३८ ।। एष एको महातेजाः पाण्डुपुत्रो धनंजयः। पिता च मम धर्मात्मा तस्य मे निष्कृतिः कुतः ।। ३९ ।।