अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 352, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्र्यशीतितमोऽध्यायः दक्षिण और पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें होते हुए अश्वका द्वारका, पञ्चनद एवं गान्धार देशमें प्रवेश वैशम्पायन उवाच मागधेनार्चितो राजन् पाण्डवः श्वेतवाहनः । दक्षिणां दिशमास्थाय चारयामास तं हयम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मगधराजसे पूजित हो पाण्डुपुत्र श्वेतवाहन अर्जुनने दक्षिण दिशाका आश्रय ले उस घोड़ेको घुमाना आरम्भ किया ॥ १ ॥ ततः स पुनरावर्त्य हयः कामचरो बली । आससाद पुरीं रम्यां चेदीनां शुक्तिसाह्वयाम् ॥ २ ॥ वह इच्छानुसार विचरनेवाला अश्व पुनः उधरसे लौटकर चेदियोंकी रमणीय राजधानीमें जो शुक्तिपुरी (या माहिष्मतीपुरी)-के नामसे विख्यात थी, आया ॥ २ ॥ शरभेणार्चितस्तत्र शिशुपालसुतेन सः । युद्धपूर्वं तदा तेन पूजया च महाबलः ॥ ३ ॥ वहाँ शिशुपालके पुत्र शरभने पहले तो युद्ध किया और फिर स्वागत-सत्कारके द्वारा उस महाबली अश्वका पूजन किया ॥ ३ ॥ ततोऽर्चितो ययौ राजंस्तदा स तुरगोत्तमः । काशीनगान् कोसलांश्च किरातानथ तङ्गणान् ॥ ४ ॥ राजन्! शरभसे पूजित हो वह उत्तम अश्व काशी, कोसल, किरात और तङ्गण आदि जनपदोंमें गया ॥ ४ ॥ पूजां तत्र यथान्यायं प्रतिगृह्य धनंजयः । पुनरावृत्य कौन्तेयो दशार्णानगमत् तदा ॥ ५ ॥ उन सभी राज्योंमें यथोचित पूजा ग्रहण करके कुन्तीनन्दन अर्जुन पुनः लौटकर दशार्ण देशमें आये ॥ ५ ॥ तत्र चित्राङ्गदी नाम बलवानरिमर्दनः । तेन युद्धमभूत् तस्य विजयस्यातिभैरवम् ॥ ६ ॥ वहाँ उस समय महाबली शत्रुमर्दन चित्रांगद नामक नरेश राज्य करते थे। उनके साथ अर्जुनका बड़ा भयंकर युद्ध हुआ ॥ ६ ॥ तं चापि वशमानीय किरीटी पुरुषर्षभः । निषादराज्ञो विषयमेकलव्यस्य जग्मिवान् ॥ ७ ॥