अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 353, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुरुषप्रवर किरीटधारी अर्जुन दशार्णराज चित्रांगदको भी वशमें करके निषादराज एकलव्यके राज्यमें गये ॥ ७ ॥ एकलव्यसुतश्चैनं युद्धेन जगृहे तदा । तत्र चक्रे निषादैः स संग्रामं लोमहर्षणम् ॥ ८ ॥ वहाँ एकलव्यके पुत्रने युद्धके द्वारा उनका स्वागत किया। अर्जुनने निषादोंके साथ रोमांचकारी संग्राम किया ॥ ८ ॥ ततस्तमपि कौन्तेयः समरेष्वपराजितः । जिगाय युधि दुर्धर्षो यज्ञविघ्नार्थमागतम् ॥ ९ ॥ युद्धमें किसीसे परास्त न होनेवाले दुर्धर्ष वीर पार्थने यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये आये हुए एकलव्य-कुमारको भी परास्त कर दिया ॥ ९ ॥ स तं जित्वा महाराज नैषादिं पाकशासनिः । अर्चितः प्रययौ भूयो दक्षिणं सलिलार्णवम् ॥ १० ॥ महाराज! एकलव्यके पुत्रको पराजित करके उसके द्वारा पूजित हुए इन्द्रकुमार अर्जुन फिर दक्षिण समुद्रके तटपर गये ॥ १० ॥ तत्रापि द्रविडैरान्ध्रै रौद्रैर्माहिषकैरपि । तथा कोल्लगिरेयैश्च युद्धमासीत् किरीटिनः ॥ ११ ॥ वहाँ भी द्रविड़, आन्ध्र, रौद्र, माहिषक और कोलाचलके प्रान्तोंमें रहनेवाले वीरोंके साथ किरीटधारी अर्जुनका खूब युद्ध हुआ ॥ ११ ॥ तांश्चापि विजयो जित्वा नातितीव्रेण कर्मणा । तुरङ्गमवशेनार्थ सुराष्ट्रानभितो ययौ ॥ १२ ॥ गोकर्णमथ चासाद्य प्रभासमपि जग्मिवान् । उन सबको मृदुल पराक्रमसे ही जीतकर वे घोड़ेकी इच्छानुसार उसके पीछे चलनेमें विवश हुए सौराष्ट्र, गोकर्ण और प्रभासक्षेत्रोंमें गये ॥ १२ १/२ ॥ ततो द्वारवतीं रम्यां वृष्णिवीराभिपालिताम् ॥ १३ ॥ आससाद हयः श्रीमान् कुरुराजस्य यज्ञियः । तत्पश्चात् कुरुराज युधिष्ठिरका वह यज्ञसम्बन्धी कान्तिमान् अश्व वृष्णिवीरोंद्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीमें जा पहुँचा ॥ १३ १/२ ॥ तमुन्मथ्य हयश्रेष्ठं यादवानां कुमारकाः ॥ १४ ॥ प्रयुयुत्सुंस्तदा राजन्नुग्रसेनो न्यवारयत् । राजन्! वहाँ यदुवंशी वीरोंके बालकोंने उस उत्तम अश्वको बलपूर्वक पकड़कर युद्धके लिये उद्योग किया; परंतु महाराज उग्रसेनने उन्हें रोक दिया ॥ १४ १/२ ॥ ततः पुराद् विनिष्क्रम्य वृष्ण्यन्धकपतिस्तदा ॥ १५ ॥ सहितो वसुदेवेन मातुलेन किरीटिनः ।