अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 354, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंतौ समेत्य कुरुश्रेष्ठं विधिवत् प्रीतिपूर्वकम् ।। १६ ।। परया भारतश्रेष्ठं पूजया समवस्थितौ । ततस्ताभ्यामनुज्ञातो ययौ येन हयो गतः ।। १७ ।। तदनन्तर अर्जुनके मामा वसुदेवको साथ ले वृष्णि और अन्धककुलके राजा उग्रसेन नगरसे बाहर निकले। वे दोनों बड़ी प्रसन्नताके साथ कुरुश्रेष्ठ अर्जुनसे विधिपूर्वक मिले। उन्होंने भरतकुलके उस श्रेष्ठ वीरका बड़ा आदर-सत्कार किया। फिर उन दोनोंकी आज्ञा ले अर्जुन उसी ओर चल दिये, जिधर वह अश्व गया था ।। ततः स पश्चिमं देशं समुद्रस्य तदा हयः । क्रमेण व्यचरत् स्फीतं ततः पञ्चनदं ययौ ।। १८ ।। वहाँसे पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें विचरता हुआ वह घोड़ा क्रमशः आगे बढ़ने लगा और समृद्धिशाली पञ्चनद प्रदेशमें जा पहुँचा ।। १८ ।। तस्मादपि स कौरव्य गन्धारविषयं हयः । विचचार यथाकामं कौन्तेयानुगतस्तदा ।। १९ ।। कुरुनन्दन! वहाँसे भी वह घोड़ा गान्धारदेशमें जाकर इच्छानुसार विचरने लगा। कुन्तीनन्दन अर्जुन भी उसके पीछे-पीछे वहीं जा पहुँचे ।। १९ ।। ततो गान्धारराजेन युद्धमासीत् किरीटिनः ।