अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 360, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशीतितमोऽध्यायः यज्ञभूमिकी तैयारी, नाना देशोंसे आये हुए राजाओंका यज्ञकी सजावट और आयोजन देखना वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वानुययौ पार्थो हयं कामविहारिणम् । न्यवर्तत ततो वाजी येन नागाह्वयं पुरम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! गान्धारराजसे यों कहकर अर्जुन इच्छानुसार विचरनेवाले घोड़ेके पीछे चल दिये। अब वह घोड़ा लौटकर हस्तिनापुरकी ओर चला ॥ १ ॥ तं निवृत्तं तु शुश्राव चारेणैव युधिष्ठिरः । श्रुत्वार्जुनं कुशलिनं स च हृष्टमनाऽभवत् ॥ २ ॥ इसी समय राजा युधिष्ठिरको एक जासूसके द्वारा यह समाचार मिला कि घोड़ा हस्तिनापुरको लौट रहा है और अर्जुन भी सकुशल आ रहे हैं। यह सुनकर उनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २ ॥ विजयस्य च तत् कर्म गान्धारविषये तदा । श्रुत्वा चान्येषु देशेषु स सुप्रीतोऽभवत् तदा ॥ ३ ॥ अर्जुनने गान्धारराज्यमें तथा अन्यान्य देशोंमें जो अद्भुत पराक्रम किया था, वह सब सुनकर युधिष्ठिरके हर्षकी सीमा न रही ॥ ३ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु द्वादशीं माघमासिकीम् । इष्टं गृहीत्वा नक्षत्रं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ४ ॥ समानीय महातेजाः सर्वान् भ्रातॄन् महीपतिः । भीमं च नकुलं चैव सहदेवं च कौरव ॥ ५ ॥ प्रोवाचेदं वचः काले तदा धर्मभृतां वरः । आमन्त्र्य वदतां श्रेष्ठो भीमं प्रहरतां वरम् ॥ ६ ॥ कुरुनन्दन! उस दिन माघ महीनेकी शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि थी। उसमें पुष्य- नक्षत्रका योग पाकर महातेजस्वी पृथिवीपति धर्मराज युधिष्ठिरने अपने समस्त भाइयों— भीमसेन, नकुल और सहदेवको बुलवाया और प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ भीमसेनको सम्बोधित करके वक्ताओं तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने यह समयोचित बात कही — ॥ ४—६ ॥ आयाति भीमसेनासौ सहाश्वेन तवानुजः ।