भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पञ्चाशीतितमोऽध्यायः यज्ञभूमिकी तैयारी, नाना देशोंसे आये हुए राजाओंका यज्ञकी सजावट और आयोजन देखना वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वानुययौ पार्थो हयं कामविहारिणम् । न्यवर्तत ततो वाजी येन नागाह्वयं पुरम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! गान्धारराजसे यों कहकर अर्जुन इच्छानुसार विचरनेवाले घोड़ेके पीछे चल दिये। अब वह घोड़ा लौटकर हस्तिनापुरकी ओर चला ॥ १ ॥ तं निवृत्तं तु शुश्राव चारेणैव युधिष्ठिरः । श्रुत्वार्जुनं कुशलिनं स च हृष्टमनाऽभवत् ॥ २ ॥ इसी समय राजा युधिष्ठिरको एक जासूसके द्वारा यह समाचार मिला कि घोड़ा हस्तिनापुरको लौट रहा है और अर्जुन भी सकुशल आ रहे हैं। यह सुनकर उनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २ ॥ विजयस्य च तत् कर्म गान्धारविषये तदा । श्रुत्वा चान्येषु देशेषु स सुप्रीतोऽभवत् तदा ॥ ३ ॥ अर्जुनने गान्धारराज्यमें तथा अन्यान्य देशोंमें जो अद्भुत पराक्रम किया था, वह सब सुनकर युधिष्ठिरके हर्षकी सीमा न रही ॥ ३ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु द्वादशीं माघमासिकीम् । इष्टं गृहीत्वा नक्षत्रं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ४ ॥ समानीय महातेजाः सर्वान् भ्रातॄन् महीपतिः । भीमं च नकुलं चैव सहदेवं च कौरव ॥ ५ ॥ प्रोवाचेदं वचः काले तदा धर्मभृतां वरः । आमन्त्र्य वदतां श्रेष्ठो भीमं प्रहरतां वरम् ॥ ६ ॥ कुरुनन्दन! उस दिन माघ महीनेकी शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि थी। उसमें पुष्य- नक्षत्रका योग पाकर महातेजस्वी पृथिवीपति धर्मराज युधिष्ठिरने अपने समस्त भाइयों— भीमसेन, नकुल और सहदेवको बुलवाया और प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ भीमसेनको सम्बोधित करके वक्ताओं तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने यह समयोचित बात कही — ॥ ४—६ ॥ आयाति भीमसेनासौ सहाश्वेन तवानुजः ।

यथा मे पुरुषाः प्राहुर्र्ये धनंजयसारिणः ॥ ७ ॥ 'भीमसेन! तुम्हारे छोटे भाई अर्जुन घोड़ेके साथ आ रहे हैं, जैसा कि उनका समाचार लानेके लिये गये जासूसोंने मुझे बताया है ॥ ७ ॥ उपस्थितश्च कालोऽयमभितो वर्तते हयः । माघी च पौर्णमासीयं मासः शेषो वृकोदर ॥ ८ ॥ 'वृकोदर! इधर यज्ञ आरम्भ करनेका समय भी निकट आ गया है। घोड़ा भी पास ही है। यह माघ-मासकी पूर्णिमा आ रही है, अब बीचमें केवल फाल्गुनका एक मास शेष है ॥ ८ ॥ प्रस्थाप्यन्तां हि विद्वांसो ब्राह्मणा वेदपारगाः । वाजिमेधार्थसिद्धयर्थं देशं पश्यन्तु यज्ञियम् ॥ ९ ॥ 'अतः वेदके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंको भेजना चाहिये कि वे अश्वमेध-यज्ञकी सिद्धिके लिये उपयुक्त स्थान देखें' ॥ ९ ॥ इत्युक्तः स तु तच्चक्रे भीमो नृपतिशासनम् । हृष्टः श्रुत्वा गुडाकेशमायान्तं पुरुषर्षभम् ॥ १० ॥ यह सुनकर भीमसेनने राजाकी आज्ञाका तुरंत पालन किया। वे पुरुषप्रवर अर्जुनका आगमन सुनकर बहुत प्रसन्न थे ॥ १० ॥ ततो ययौ भीमसेनः प्राज्ञैः स्थपतिभिः सह । ब्राह्मणाग्रतः कृत्वा कुशलान् यज्ञकर्मणि ॥ ११ ॥ तत्पश्चात् भीमसेन यज्ञकर्ममें कुशल ब्राह्मणोंको आगे करके शिल्पकर्मके जानकार कारीगरोंके साथ नगरसे बाहर गये ॥ ११ ॥ तं स शालचयं श्रीमत् सप्रतोलीसुघट्टितम् । मापयामास कौरव्यो यज्ञवाटं यथाविधि ॥ १२ ॥ उन्होंने शालवृक्षोंसे भरे हुए सुन्दर स्थान पसंद करके उसे चारों ओरसे नपवाया। तत्पश्चात् कुरुनन्दन भीमने वहाँ उत्तम मार्गोंसे सुशोभित यज्ञभूमिका विधिपूर्वक निर्माण कराया ॥ १२ ॥ प्रासादशतसम्बाधं मणिप्रवरकुट्टिमम् । कारयामास विधिवद्धेमरत्नविभूषितम् ॥ १३ ॥ उस भूमिमें सैकड़ों महल बनवाये गये, जिसके फर्शमें अच्छे-अच्छे रत्न जड़े हुए थे। वह यज्ञशाला सोने और रत्नोंसे सजायी गयी थी और उसका निर्माण शास्त्रीय विधिके अनुसार कराया गया था ॥ १३ ॥ स्तम्भान् कनकचित्रांश्च तोरणानि बृहन्ति च । यज्ञायतनदेशेषु दत्त्वा शुद्धं च काननम् ॥ १४ ॥ अन्तःपुराणां राज्ञां च नानादेशसमीयुषाम् ।

कारयामास धर्मात्मा तत्र तत्र यथाविधि ॥ १५ ॥ ब्राह्मणानां च वेश्मानि नानादेशसमीयुषाम् । कारयामास कौन्तेयो विधिवत् तान्यनेकशः ॥ १६ ॥ वहाँ सुवर्णमय विचित्र खम्भे और बड़े-बड़े तोरण (फाटक) बने हुए थे। धर्मात्मा भीमने यज्ञमण्डपके सभी स्थानोंमें शुद्ध सुवर्णका उपयोग किया था। उन्होंने अन्तःपुरकी स्त्रियों, विभिन्न देशोंसे आये हुए राजाओं, तथा नाना स्थानोंसे पधारे हुए ब्राह्मणोंके रहनेके लिये भी अनेकानेक उत्तम भवन बनवाये। उन सबका निर्माण कुन्तीकुमार भीमने शिल्पशास्त्रकी विधिके अनुसार कराया था ॥ १४—१६ ॥ तथा सम्प्रेषयामास दूतान् नृपतिशासनात् । भीमसेनो महाबाहो राज्ञामक्लिष्टकर्मणाम् ॥ १७ ॥ महाबाहो! यह सब काम हो जानेपर भीमसेनने महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे अनायास ही महान् पराक्रम कर दिखानेवाले विभिन्न राजाओंको निमन्त्रण देनेके लिये बहुत-से दूत भेजे ॥ १७ ॥ ते प्रियार्थं कुरुपतेराययुर्नृपसत्तम । रत्नान्यनेकान्यादाय स्त्रियोऽश्वानायुधानि च ॥ १८ ॥ नृपश्रेष्ठ! निमन्त्रण पाकर वे सभी नरेश कुरुराज युधिष्ठिरका प्रिय करनेके लिये अनेकानेक रत्न, स्त्रियाँ, घोड़े और भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र लेकर वहाँ उपस्थित हुए ॥ १८ ॥ तेषां निविशतां तेषु शिबिरेषु महात्मनाम् । नर्दतः सागरस्येव दिवस्पृगभवत् स्वनः ॥ १९ ॥ वहाँ बने हुए विभिन्न शिविरोंमें प्रवेश करनेवाले महामनस्वी नरेशोंका जो कोलाहल सुनायी पड़ता था, वह समुद्र की गम्भीर गर्जनाके समान सम्पूर्ण आकाशमें व्याप्त हो रहा था ॥ १९ ॥ तेषामभ्यागतानां च स राजा कुरुवर्धनः । व्यादिदेशान्नपानानि शय्याश्चाप्यतिमानुषाः ॥ २० ॥ कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले राजा युधिष्ठिरने इन नवागत अतिथियोंका सत्कार करनेके लिये अन्न-पान और अलौकिक शय्याओंका प्रबन्ध किया ॥ २० ॥ वाहनानां च विविधाः शालाः शालीक्षुगोरसैः । उपेता भरतश्रेष्ठो व्यादिदेश च धर्मराट् ॥ २१ ॥ भरतभूषण! धर्मराज युधिष्ठिरने उन राजाओंकी सवारियोंके लिये भी धान, ऊँख और गोरससे भरे-पूरे घर दिये ॥ २१ ॥ तथा तस्मिन् महायज्ञे धर्मराजस्य धीमतः । समाजग्मुर्मुनिगणा बहवो ब्रह्मवादिनः ॥ २२ ॥

बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके उस महायज्ञमें बहुत-से वेदवेत्ता मुनिगण भी पधारे थे ॥ २२ ॥ ये च द्विजातिप्रवरास्तत्रासन् पृथिवीपते । समाजग्मुः सशिष्यास्तान् प्रतिजग्राह कौरवः ॥ २३ ॥ पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणोंमें जो श्रेष्ठ पुरुष थे, वे सब अपने शिष्योंको साथ लेकर वहाँ आये। कुरुराज युधिष्ठिरने उन सबको स्वागतपूर्वक अपनाया ॥ २३ ॥ सर्वांश्च ताननुययौ यावदावसथान् प्रति । स्वयमेव महातेजा दम्भं त्यक्त्वा युधिष्ठिरः ॥ २४ ॥ वहाँ महातेजस्वी महाराज युधिष्ठिर दम्भ छोड़कर स्वयं ही उन सबका विधिवत् सत्कार करते और जबतक उनके लिये योग्य स्थानका प्रबन्ध न हो जाता, तबतक उनके साथ-साथ रहते थे ॥ २४ ॥ ततः कृत्वा स्थपतयः शिल्पिनोऽन्ये च ये तदा । कृत्स्नं यज्ञविधिं राज्ञो धर्मज्ञाय न्यवेदयन् ॥ २५ ॥ तत्पश्चात् थवइयों और अन्यान्य शिल्पियों (कारीगरों) ने आकर राजा युधिष्ठिरको यह सूचना दी कि यज्ञमण्डपका सारा कार्य पूरा हो गया ॥ २५ ॥ तच्छ्रुत्वा धर्मराजस्तु कृतं सर्वमतन्द्रितः । हृष्टरूपोऽभवद् राजा सह भ्रातृभिरादृतः ॥ २६ ॥ सब कार्य पूरा हो गया। यह सुनकर आलस्य-रहित धर्मराज राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ बहुत प्रसन्न हुए ॥ २६ ॥ वैशम्पायन उवाच तस्मिन् यज्ञे प्रवृत्ते तु वाग्मिनो हेतुवादिनः । हेतुवादान् बहूनाहुः परस्परजिगीषवः ॥ २७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! वह यज्ञ आरम्भ होनेपर बहुत-से प्रवचनकुशल और युक्तिवादी विद्वान्, जो एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखते थे, वहाँ अनेक प्रकारसे तर्ककी बातें करने लगे ॥ २७ ॥ ददृशुस्तं नृपतयो यज्ञस्य विधिमुत्तमम् । देवेन्द्रस्येव विहितं भीमसेनेन भारत ॥ २८ ॥ भारत! यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये आये हुए राजा लोग घूम-घूमकर भीमसेनके द्वारा तैयार कराये हुए उस यज्ञमण्डपकी उत्तम निर्माण कला एवं सुन्दर सजावट देखने लगे। वह मण्डप देवराज इन्द्रकी यज्ञशालाके समान जान पड़ता था ॥ २८ ॥ ददृशुस्तोरणान्यत्र शातकुम्भमयानि ते । शय्यासनविहारांश्च सुबहून् रत्नसंचयान् ॥ २९ ॥

उन्होंने वहाँ सुवर्णके बने हुए तोरण, शय्या, आसन, विहारस्थान तथा बहुत-से रत्नोंके ढेर देखे ।। २९ ।। घटान् पात्री: कटाहानि कलशान् वर्धमानकान् । न हि किञ्चिदसौवर्णमपश्यन् वसुधाधिपा: ।। ३० ।। घड़े, बर्तन, कड़ाहे, कलश और बहुत-से कटोरे भी उनकी दृष्टिमें पड़े। उन पृथ्वीपतियोंने वहाँ कोई भी ऐसा सामान नहीं देखा, जो सोनेका बना हुआ न हो ।। ३० ।। यूपांश्च शास्त्रपठितान् दारवान् हेमभूषितान् । उपक्लृप्तान् यथाकालं विधिवद् भूरिवर्चस: ।। ३१ ।। शास्त्रोक्त विधिके अनुसार जो काष्ठके यूप बने हुए थे, उनमें भी सोना जड़ा हुआ था। वे सभी यूप यथासमय विधिपूर्वक बनाये गये थे जो देखनेमें अत्यन्त तेजोमय जान पड़ते थे ।। ३१ ।। स्थलजा जलजा ये च पशव: केचन प्रभो । सर्वानैव समानीतानपश्यंस्तत्र ते नृपा: ।। ३२ ।। प्रभो! संसारके भीतर स्थल और जलमें उत्पन्न होनेवाले जो कोई पशु देखे या सुने गये थे, उन सबको वहाँ राजाओंने उपस्थित देखा ।। ३२ ।। गाश्चैव महिषीश्चैव तथा वृद्धस्त्रियोऽपि च । औदकानि च सत्त्वानि श्वापदानि वयांसि च ।। ३३ ।। जरायुजाण्डजातानि स्वेदजान्युद्धिजानि च । पर्वतानूपजातानि भूतानि ददृशुश्च ते ।। ३४ ।। गायें, भैंसें, बूढ़ी स्त्रियाँ, जल-जन्तु, हिंसक जन्तु, पक्षी, जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज, पर्वतीय तथा सागरतटपर उत्पन्न होनेवाले प्राणी—ये सभी वहाँ दृष्टिगोचर हुए ।। ३३-३४ ।। एवं प्रमुदितं सर्वं पशुगोधनधान्यतः । यज्ञवाटं नृपा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता: ।। ३५ ।। इस प्रकार वह यज्ञशाला पशु, गौ, धन और धान्य सभी दृष्टियोंसे सम्पन्न एवं आनन्द बढ़ानेवाली थी। उसे देखकर समस्त राजाओंको बड़ा विस्मय हुआ ।। ३५ ।। ब्राह्मणानां विशां चैव बहुमृष्टान्नमुद्धिमत् । पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां तत्र भुञ्जताम् ।। ३६ ।। दुन्दुभिर्मेघनिर्घोषो मुहुर्मुहुरताडयत् । विननादासकृच्चापि दिवसे दिवसे गते ।। ३७ ।। ब्राह्मणों और वैश्योंके लिये वहाँ परम स्वादिष्ट अन्नका भण्डार भरा हुआ था। प्रतिदिन एक लाख ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर वहाँ मेघ-गर्जनाके समान शब्द करनेवाला डंका बार-बार पीटा जाता था। इस प्रकारके डंके वहाँ दिनमें कई बार पीटे जाते थे ।।

एवं स ववृते यज्ञो धर्मराजस्य धीमतः । अन्नस्य सुबहून् राजन्नुत्सर्गान् पर्वतोपमान् ॥ ३८ ॥ दधिकुल्याश्च ददृशुः सर्पिषश्च ह्रदान् जनाः । जम्बूद्वीपो हि सकलो नानाजनपदायतः ॥ ३९ ॥ राजन्नदृश्यतैकस्थो राज्ञस्तस्य महामखे । राजन्! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरका वह यज्ञ रोज-रोज इसी रूपमें चालू रहा। उस स्थानपर अन्नके बहुत-से पहाड़ों जैसे ढेर लगे रहते थे। दहीकी नहरें बनी हुई थीं और घीके बहुत-से तालाब भरे हुए थे। राजा युधिष्ठिरके उस महान् यज्ञमें अनेक देशोंके लोग जुटे हुए थे। राजन्! सारा जम्बूद्वीप ही वहाँ एक स्थानमें स्थित दिखायी देता था ॥ ३८-३९ १/२ ॥ तत्र जातिसहस्राणि पुरुषाणां ततस्ततः ॥ ४० ॥ गृहीत्वा भाजनान् जग्मुर्बहूनि भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! वहाँ हजारों प्रकारकी जातियोंके लोग बहुत-से पात्र लेकर उपस्थित होते थे ॥ ४० १/२ ॥ स्रग्विणश्चापि ते सर्वे सुमृष्टमणिकुण्डलाः ॥ ४१ ॥ पर्यवेषन् द्विजातींस्तान् शतशोऽथ सहस्रशः । विविधान्यन्नपानानि पुरुषा येऽनुयायिनः । ते वै नृपोपभोज्यानि ब्राह्मणानां ददुश्च ह ॥ ४२ ॥ सैकड़ों और हजारों मनुष्य वहाँ ब्राह्मणोंको तरह-तरहके भोजन परोसते थे। वे सब- के-सब सोनेके हार और विशुद्ध मणिमय कुण्डलोंसे अलंकृत होते थे। राजाके अनुयायी पुरुष वहाँ ब्राह्मणोंको तरह-तरहके अन्न-पान एवं राजोचित भोजन अर्पित करते थे ॥ ४१-४२ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधयज्ञका आरम्भविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥

षडशीतितमोऽध्यायः राजा युधिष्ठिरका भीमसेनको राजाओंकी पूजा करनेका आदेश और श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे अर्जुनका संदेश कहना वैशम्पायन उवाच समागतान् वेदविदो राज्ञश्च पृथिवीश्वरान् । दृष्ट्वा युधिष्ठिरो राजा भीमसेनमभाषत ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वहाँ आये हुए वेदवेत्ता विद्वानों और पृथ्‍वीका शासन करनेवाले राजाओंको देखकर राजा युधिष्ठिरने भीमसेनसे कहा— ॥ १ ॥ उपयाता नरव्याघ्रा य एते पृथिवीश्वराः । एतेषां क्रियतां पूजा पूजार्हा हि नराधिपाः ॥ २ ॥ 'भाई! ये जो भूमण्डलका शासन करनेवाले राजा यहाँ पधारे हुए हैं, सभी पुरुषोंमें श्रेष्ठ एवं पूजाके योग्य हैं; अतः तुम इनकी यथोचित पूजा (सत्कार) करो' ॥ २ ॥ इत्युक्तः स तथा चक्रे नरेन्द्रेण यशस्विना । भीमसेनो महातेजा यमाभ्यां सह पाण्डवः ॥ ३ ॥ यशस्वी महाराजके इस प्रकार आदेश देनेपर महातेजस्वी पाण्डुपुत्र भीमसेनने नकुल और सहदेवको साथ लेकर सब राजाओंका युधिष्ठिरके आज्ञानुसार यथोचित सत्कार किया ॥ ३ ॥ अथाभ्यगच्छद्गोविन्दो वृष्णिभिः सह धर्मजम् । बलदेवं पुरस्कृत्य सर्वप्राणभृतां वरः ॥ ४ ॥ युयुधानेन सहितः प्रद्युम्नेन गदेन च । निशठेनाथ साम्बेन तथैव कृतवर्मणा ॥ ५ ॥ इसके बाद समस्त प्राणियोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण बलदेवजीको आगे करके सात्यकि, प्रद्युम्न, गद, निशठ, साम्ब तथा कृतवर्मा आदि वृष्णिवंशियोंके साथ युधिष्ठिरके पास आये ॥ ४-५ ॥ तेषामपि परां पूजां चक्रे भीमो महारथः । विविशुस्ते च वेश्मानि रत्नवन्ति च सर्वशः ॥ ६ ॥ महारथी भीमसेनने उन लोगोंका भी विधिवत् सत्कार किया। फिर वे रत्नोंसे भरे-पूरे घरोंमें जाकर रहने लगे ॥ ६ ॥ युधिष्ठिरसमीपे तु कथान्ते मधुसूदनः । अर्जुनं कथयामास बहुसंग्रामकर्षितम् ॥ ७ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण युधिष्ठिरके पास बैठकर थोड़ी देरतक बातचीत करते रहे। उसीमें उन्होंने बताया—'अर्जुन बहुत-से युद्धोंमें शत्रुओंका सामना करनेके कारण दुर्बल हो गये हैं' ॥ ७ ॥ स तं पप्रच्छ कौन्तेयः पुनः पुनररिंदमम् । धर्मजः शक्रजं जिष्णुं समाचष्ट जगत्पतिः ॥ ८ ॥ यह सुनकर धर्मपुत्र कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने शत्रुदमन इन्द्रकुमार अर्जुनके विषयमें बारम्बार उनसे पूछा। तब जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ८ ॥ आगमद् द्वारकावासी ममाप्तः पुरुषो नृप । योऽद्राक्षीत् पाण्डवश्रेष्ठं बहुसंग्रामकर्षितम् ॥ ९ ॥ ‘राजन्! मेरे पास द्वारकाका रहनेवाला एक विश्वासपात्र मनुष्य आया था। उसने पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनको अपनी आँखों देखा था। वे अनेक स्थानोंपर युद्ध करनेके कारण बहुत दुर्बल हो गये हैं ॥ ९ ॥ समीपे च महाबाहुमाचष्ट च मम प्रभो । कुरु कार्याणि कौन्तेय हयमेधार्थसिद्धये ॥ १० ॥ ‘प्रभो! उसने यह भी बताया है कि महाबाहु अर्जुन अब निकट आ गये हैं। अतः कुन्तीनन्दन! अब आप अश्वमेधयज्ञकी सिद्धिके लिये आवश्यक कार्य आरम्भ कर दीजिये' ॥ १० ॥ इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं धर्मराजो युधिष्ठिरः । दिष्ट्या स कुशली जिष्णुरुपायाति च माधव ॥ ११ ॥ उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने पुनः प्रश्न किया—'माधव! बड़े सौभाग्यकी बात है कि अर्जुन सकुशल लौट रहे हैं ॥ ११ ॥ यदिदं संदिदेशास्मिन् पाण्डवानां बलाग्रणीः । तदा ज्ञातुमिहेच्छामि भवता यदुनन्दन ॥ १२ ॥ ‘यदुनन्दन! पाण्डवसेनाके अग्रगामी अर्जुनने इस यज्ञके सम्बन्धमें जो कुछ संदेश दिया हो, उसे मैं आपके मुँहसे सुनना चाहता हूँ' ॥ १२ ॥ इत्युक्तो धर्मराजेन वृष्ण्यन्धकपतिस्तदा । प्रोवाचेदं वचो वाग्मी धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ॥ १३ ॥ धर्मराजके इस प्रकार पूछनेपर वृष्णि और अन्धकवंशी यादवोंके स्वामी प्रवचनकुशल भगवान् श्रीकृष्णने धर्मात्मा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥ इदमाह महाराज पार्थवाक्यं स्मरन् नरः । वाच्यो युधिष्ठिरः कृष्ण काले वाक्यमिदं मम ॥ १४ ॥ “महाराज! जो मनुष्य मेरे पास आया था, उसने अर्जुनकी बात याद करके मुझसे इस प्रकार कहा—'श्रीकृष्ण! आप ठीक समयपर मेरा यह कथन महाराज युधिष्ठिरको सुना

दीजियेगा ।। १४ ।। आगमिष्यन्ति राजानः सर्वे वै कौरवर्षभ । प्राप्तानां महतां पूजा कार्या ह्येतत् क्षमं हि नः ।। १५ ।। "(अर्जुन कहते हैं—) 'कौरवश्रेष्ठ! अश्वमेधयज्ञमें प्रायः सभी राजा पधारेंगे। जो आ जायँ उन सबको महान् मानकर उन सबका पूर्ण सत्कार करना चाहिये। यही हमारे योग्य कार्य है ।। १५ ।। इत्येतद्वचनाद् राजा विज्ञाप्यो मम मानद । यथा चात्ययिकं न स्याद् यदर्घ्याहरणेऽभवत् ।। १६ ।। ("इतना कहकर वे फिर मुझसे बोले—) 'मानद! मेरी ओरसे तुम राजा युधिष्ठिरको यह सूचित कर देना कि राजसूय-यज्ञमें अर्घ्य देते समय जो दुर्घटना हो गयी थी, वैसी इस बार नहीं होनी चाहिये ।। १६ ।। कर्तुमर्हति तद् राजा भवांश्चाप्यनुमन्यताम् । राजद्वेषान्न नश्येयुरिमा राजन् पुनः प्रजाः ।। १७ ।। "श्रीकृष्ण! राजा युधिष्ठिरको ऐसा ही करना चाहिये। आप भी उन्हें ऐसी ही अनुमति दें और बतावें कि 'राजन्! राजाओंके पारस्परिक द्वेषसे पुनः इन सारी प्रजाओंका विनाश न होने पावे' ।। १७ ।। इदमन्यच्च कौन्तेय वचः स पुरुषोऽब्रवीत् । धनंजयस्य नृपते तन्मे निगदतः शृणु ।। १८ ।। (श्रीकृष्ण कहते हैं—) 'कुन्तीनन्दन नरेश्वर! उस मनुष्यने अर्जुनकी कही हुई यह एक बात और बतायी थी, उसे भी मेरे मुँहसे सुन लीजिये ।। १८ ।। उपायास्यति यज्ञं नो मणिपूरपतिर्नृपः । पुत्रो मम महातेजा दयितो बभ्रुवाहनः ।। १९ ।। "हमलोगोंके इस यज्ञमें मणिपुरका राजा बभ्रुवाहन भी आवेगा, जो महान् तेजस्वी और मेरा परम प्रिय पुत्र है ।। १९ ।। तं भवान् मदपेक्षार्थं विधिवत् प्रतिपूजयेत् । स तु भक्तोऽनुरक्तश्च मम नित्यमिति प्रभो ।। २० ।। "प्रभो! उसकी सदा मेरे प्रति बड़ी भक्ति और अनुरक्ति रहती है। इसलिये आप मेरी अपेक्षासे उसका विधिपूर्वक विशेष सत्कार करें" ।। २० ।। इत्येतद् वचनं श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । अभिनन्द्यास्य तद् वाक्यमिदं वचनमब्रवीत् ।। २१ ।। अर्जुनका यह संदेश सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उसका हृदयसे अभिनन्दन किया और इस प्रकार कहा ।।

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेध-यज्ञका आरम्भविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

सप्ताशीतितमोऽध्यायः अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरकी बातचीत, अर्जुनका हस्तिनापुरमें जाना तथा उलूपी और चित्राङ्गदाके साथ बभ्रुवाहनका आगमन युधिष्ठिर उवाच श्रुतं प्रियमिदं कृष्ण यत् त्वमर्हसि भाषितुम् । तन्मेऽमृतरसं पुण्यं मनो ह्लादयति प्रभो ॥ १ ॥ युधिष्ठिर बोले—प्रभो! श्रीकृष्ण! मैंने यह प्रिय संदेश सुना, जिसे आप ही कहने या सुनानेके योग्य हैं। आपका यह अमृतरससे परिपूर्ण पवित्र वचन मेरे मनको आनन्दमग्न किये देता है ॥ १ ॥ बहूनि किल युद्धानि विजयस्य नराधिपैः । पुनरासन् हृषीकेश तत्र तत्र च मे श्रुतम् ॥ २ ॥ हृषीकेश! मेरे सुननेमें आया है कि भिन्न-भिन्न देशोंमें वहाँके राजाओंके साथ अर्जुनको कई बार युद्ध करने पड़े हैं ॥ २ ॥ किं निमित्तं स नित्यं हि पार्थः सुखविवर्जितः । अतीव विजयो धीमन्निति मे दूयते मनः ॥ ३ ॥ संचिन्तयामि कौन्तेयं रहो जिष्णुं जनार्दन । अतीव दुःखभागी स सततं पाण्डुनन्दनः ॥ ४ ॥ इसका क्या कारण है? बुद्धिमान् जनार्दन! जब मैं एकान्तमें बैठकर अर्जुनके बारेमें विचार करता हूँ, तब यह जानकर मेरा मन खिन्न हो जाता है कि हमलोगोंमें वे ही सदा सबसे अधिक दुःखके भागी रहे हैं। पाण्डुनन्दन अर्जुन सुखसे वंचित क्यों रहते हैं? यह समझमें नहीं आता ॥ ३-४ ॥ किं नु तस्य शरीरेऽस्ति सर्वलक्षणपूजिते । अनिष्टं लक्षणं कृष्ण येन दुःखान्युपाश्नुते ॥ ५ ॥ श्रीकृष्ण! उनका शरीर तो सभी शुभलक्षणोंसे सम्पन्न है। फिर उसमें अशुभ लक्षण कौन-सा है, जिससे उन्हें अधिक दुःख उठाना पड़ता है? ॥ ५ ॥ अतीवासुखभोगी स सततं कुन्तिनन्दनः । न हि पश्यामि बीभत्सोर्निन्द्यं गात्रेषु किंचन । श्रोतव्यं चेन्मयैतद् वै तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ६ ॥

कुन्तीनन्दन अर्जुन सदा अधिक कष्ट भोगते हैं; परंतु उनके अंगोंमें कहीं कोई निन्दनीय दोष नहीं दिखायी देता है। ऐसी दशामें उन्हें कष्ट भोगनेका कारण क्या है? यह मैं सुनना चाहता हूँ। आप मुझे विस्तारपूर्वक यह बात बतावें ॥ ६ ॥ इत्युक्तः स हृषीकेशो ध्यात्वा सुमहदुत्तरम् । राजानं भोजराजन्यवर्धनो विष्णुरब्रवीत् ॥ ७ ॥ युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर भोजवंशी क्षत्रियोंकी वृद्धि करनेवाले भगवान् हृषीकेश विष्णुने बहुत देरतक उत्तम रीतिसे चिन्तन करनेके बाद राजा युधिष्ठिरसे यों कहा — ॥ ७ ॥ न ह्यस्य नृपते किंचित् संश्लिष्टमुपलक्षये । ऋते पुरुषसिंहस्य पिण्डिकेऽस्याधिके यतः ॥ ८ ॥ ‘नरेश्वर! पुरुषसिंह अर्जुनकी पिण्डलियाँ (फिल्लियाँ) औसतसे कुछ अधिक मोटी हैं। इसके सिवा और कोई अशुभ लक्षण उनके शरीरमें मुझे भी नहीं दिखायी देता है’ ॥ ८ ॥ स ताभ्यां पुरुषव्याघ्रो नित्यमध्वसु वर्तते । न चान्यदनुपश्यामि येनासौ दुःखभाजनम् ॥ ९ ॥ ‘उन मोटी फिल्लियोंके कारण ही पुरुषसिंह अर्जुनको सदा रास्ता चलना पड़ता है। और कोई कारण मुझे नहीं दिखायी देता, जिससे उन्हें दुःख झेलना पड़े’ ॥ ९ ॥ इत्युक्तः पुरुषश्रेष्ठस्तदा कृष्णेन धीमता । प्रोवाच वृष्णिशार्दूलमेवमेतदिति प्रभो ॥ १० ॥ प्रभो! बुद्धिमान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उन वृष्णिसिंहसे कहा —‘भगवन्! आपका कहना ठीक है’ ॥ १० ॥ कृष्णा तु द्रौपदी कृष्णं तिर्यक् सासूयमैक्षत । प्रतिजग्राह तस्यास्तं प्रणयं चापि केशहा ॥ ११ ॥ सख्युः सखा हृषीकेशः साक्षादिव धनंजयः । उस समय द्रुपदकुमारी कृष्णाने भगवान् श्रीकृष्णकी ओर तिरछी चितवनसे ईर्ष्यापूर्वक देखा। केशिहन्ता श्रीकृष्णने द्रौपदीके उस प्रेमपूर्ण उपालम्भको सानन्द ग्रहण किया; क्योंकि उसकी दृष्टिमें सखा अर्जुनके मित्र भगवान् हृषीकेश साक्षात् अर्जुनके ही समान थे ॥ ११ १/२ ॥ तत्र भीमादयस्ते तु कुरवो याजकाश्च ये ॥ १२ ॥ रेमुः श्रुत्वा विचित्रां तां धनंजयकथां शुभाम् । उस समय भीमसेन आदि कौरव और यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणलोग अर्जुनके सम्बन्धमें यह शुभ एवं विचित्र बात सुनकर बहुत प्रसन्न हो रहे थे ॥ १२ १/२ ॥ तेषां कथयतामेव पुरुषोऽर्जुनसंकथाः ॥ १३ ॥ उपायाद् वचनाद् दूतो विजयस्य महात्मनः ।

उन लोगोंमें अर्जुनके सम्बन्धमें इस तरहकी बातें हो ही रही थीं कि महात्मा अर्जुनका भेजा हुआ दूत वहाँ आ पहुँचा ।। १३ ½ ।। सोऽभिगम्य कुरुश्रेष्ठं नमस्कृत्य च बुद्धिमान् ।। १४ ।। उपायातं नरव्याघ्रं फाल्गुनं प्रत्यवेदयत् । वह बुद्धिमान् दूत कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके पास जा उन्हें नमस्कार करके बोला —'पुरुषसिंह अर्जुन निकट आ गये हैं' ।। १४ ½ ।। तच्छ्रुत्वा नृपतिस्तस्य हर्षबाष्पाकुलेक्षणः ।। १५ ।। प्रियाख्याननिमित्तं वै ददौ बहुधनं तदा । यह शुभ समाचार सुनकर राजा युधिष्ठिरकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक आये और यह प्रिय वृत्तान्त निवेदन करनेके कारण उस दूतको पुरस्काररूपमें उन्होंने बहुत-सा धन दिया ।। १५ ½ ।। ततो द्वितीये दिवसे महान् शब्दो व्यवर्धत ।। १६ ।। आगच्छति नरव्याघ्रे कौरवाणां धुरंधरे । तदनन्तर दूसरे दिन कौरव-धुरंधर नरव्याघ्र अर्जुनके आते समय नगरमें महान् कोलाहल बढ़ गया ।। १६ ½ ।। ततो रेणुः समुद्भूतो विबभौ तस्य वाजिनः ।। १७ ।। अभितो वर्तमानस्य यथोच्चैःश्रवसस्तथा । उच्चैःश्रवाके समान वेगवान् और पास ही विद्यमान उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेकी टापसे उड़ी हुई धूल आकाशमें अद्भुत शोभा पा रही थी ।। १७ ½ ।। तत्र हर्षकरी वाचो नराणां शुश्रुवेऽर्जुनः ।। १८ ।। दिष्ट्यासि पार्थ कुशली धन्यो राजा युधिष्ठिरः । वहाँ अर्जुनने लोगोंके मुँहसे हर्ष बढ़ानेवाली बातें इस प्रकार सुनीं—'पार्थ! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम सकुशल लौट आये। राजा युधिष्ठिर धन्य हैं ।। कोऽन्यो हि पृथिवीं कृत्स्नां जित्वा हि युधि पार्थिवान् ।। १९ ।। चारयित्वा हयश्रेष्ठमुपागच्छेदृतेऽर्जुनात् । 'अर्जुनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर पुरुष है जो समूची पृथ्वीको जीतकर युद्धमें राजाओंको परास्त करके और अपने श्रेष्ठ अश्वको सर्वत्र घुमाकर उसके साथ सकुशल लौट आ सके ।। १९ ½ ।। ये व्यतीता महात्मानो राजानः सगरादयः ।। २० ।। तेषामपीदृशं कर्म न कदाचन शुश्रुम । 'अतीतकालमें जो सगर आदि महामनस्वी राजा हो गये हैं, उनका भी कभी ऐसा पराक्रम हमारे सुननेमें नहीं आया था ।। २० ½ ।।

नैतदन्ये करिष्यन्ति भविष्या वसुधाधिपाः ॥ २१ ॥ यत् त्वं कुरुकुलश्रेष्ठ दुष्करं कृतवानसि । 'कुरुकुलश्रेष्ठ! आपने जो दुष्कर पराक्रम कर दिखाया है, उसे भविष्यमें होनेवाले दूसरे भूपाल नहीं कर सकेंगे' ॥ २१ १/२ ॥ इत्येवं वदतां तेषां पुंसां कर्णसुखा गिरः ॥ २२ ॥ शृण्वन् विवेश धर्मात्मा फाल्गुनो यज्ञसंस्तरम् । इस प्रकार कहते हुए लोगोंकी श्रवणसुखद बातें सुनते हुए धर्मात्मा अर्जुनने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया ॥ २२ १/२ ॥ ततो राजा सहामात्यः कृष्णश्च यदुनन्दनः ॥ २३ ॥ धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य तं प्रत्युद्ययुस्तदा । उस समय मन्त्रियोंसहित राजा युधिष्ठिर तथा यदुनन्दन श्रीकृष्ण धृतराष्ट्रको आगे करके उनकी अगवानीके लिये आगे बढ़ आये थे ॥ २३ १/२ ॥ सोऽभिवाद्य पितुः पादौ धर्मराजस्य धीमतः ॥ २४ ॥ भीमादींश्चापि सम्पूज्य पर्यष्वजत केशवम् । अर्जुनने पिता धृतराष्ट्र और बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके चरणोंमें प्रणाम करके भीमसेन आदिका भी पूजन किया और श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया ॥ २४ १/२ ॥ तैः समेत्यार्चितस्तांश्च प्रत्यर्च्यथ यथाविधि ॥ २५ ॥ विशश्राम महाबाहुस्तीरं लब्ध्वेव पारगः । उन सबने मिलकर अर्जुनका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। महाबाहु अर्जुनने भी उनका विधिपूर्वक आदर-सत्कार करके उसी तरह विश्राम किया, जैसे समुद्रके पार जानेकी इच्छावाला पुरुष किनारेपर पहुँचकर विश्राम करता है ॥ २५ १/२ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु स राजा बभ्रुवाहनः ॥ २६ ॥ मातृभ्यां सहितो धीमान् कुरूनेव जगाम ह । इसी समय बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहन अपनी दोनों माताओंके साथ कुरुदेशमें जा पहुँचा ॥ २६ १/२ ॥ तत्र वृद्धान् यथावत् स कुरूनन्यांश्च पार्थिवान् ॥ २७ ॥ अभिवाद्य महबाहुस्तैश्चापि प्रतिनन्दितः । प्रविवेश पितामह्याः कुन्त्या भवनमुत्तमम् ॥ २८ ॥ वहाँ पहुँचकर वह महाबाहु नरेश कुरुकुलके वृद्ध पुरुषों तथा अन्य राजाओंको विधिवत् प्रणाम करके स्वयं भी उनके द्वारा सत्कार पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। इसके बाद वह अपनी पितामही कुन्तीके सुन्दर महलमें गया ॥ २७-२८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अर्जुनप्रत्यागमने सत्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अर्जुनका प्रत्यागमनविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥

अष्टाशीतितमोऽध्यायः

उलूपी और चित्राङ्गदाके सहित बभ्रुवाहनका रत्न-आभूषण

आदिसे सत्कार तथा अश्वमेध-यज्ञका आरम्भ

वैशम्पायन उवाच स प्रविश्य महाबाहुः पाण्डवानां निवेशनम् । पितामहीमभ्यवन्दत् साम्ना परमवल्गुना ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पाण्डवोंके महलमें प्रवेश करके महाबाहु बभ्रुवाहनने अत्यन्त मधुर वचन बोलकर अपनी दादी कुन्तीके चरणोंमें प्रणाम किया ।। ततश्चित्राङ्गदा देवी कौरव्यस्यात्मजापि च । पृथां कृष्णां च सहिते विनयेनोपजग्मतुः ।। २ ।। इसके बाद देवी चित्रांगदा और कौरव्यनागकी पुत्री उलूपीने भी एक साथ ही विनीत भावसे कुन्ती और द्रौपदीके चरण छुए ।। २ ।। सुभद्रां च यथान्यायं याश्चान्याः कुरुयोषितः ।

ददौ कुन्ती ततस्ताभ्यां रत्नानि विविधानि च ॥ ३ ॥ फिर सुभद्रा तथा कुरुकुलकी अन्य स्त्रियोंसे भी वे यथायोग्य मिलीं। उस समय कुन्तीने उन दोनोंको नाना प्रकारके रत्न भेंटमें दिये ॥ ३ ॥ द्रौपदी च सुभद्रा च याश्चाप्यन्याऽददुः स्त्रियः । ऊषतुस्तत्र ते देव्यौ महार्हशयनासने ॥ ४ ॥ द्रौपदी, सुभद्रा तथा अन्य स्त्रियोंने भी अपनी ओरसे नाना प्रकारके उपहार दिये। तत्पश्चात् वे दोनों देवियाँ बहुमूल्य शय्याओंपर विराजमान हुईं ॥ ४ ॥ सुपूजिते स्वयं कुन्त्या पार्थस्य हितकाम्यया । स च राजा महातेजाः पूजितो बभ्रुवाहनः ॥ ५ ॥ धृतराष्ट्रं महीपालमुपतस्थे यथाविधि । अर्जुनके हितकी कामनासे कुन्तीदेवीने स्वयं ही उन दोनोंका बड़ा सत्कार किया। कुन्तीसे सत्कार पाकर महातेजस्वी राजा बभ्रुवाहन महाराज धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित हुआ और उसने विधिपूर्वक उनका चरण-स्पर्श किया ॥ ५ १/२ ॥ युधिष्ठिरं च राजानं भीमादींश्चापि पाण्डवान् ॥ ६ ॥ उपागम्य महातेजा विनयेनाभ्यवादयत् । इसके बाद राजा युधिष्ठिर और भीमसेन आदि सभी पाण्डवोंके पास जाकर उस महातेजस्वी नरेशने विनयपूर्वक उनका अभिवादन किया ॥ ६ १/२ ॥ स तैः प्रेम्णा परिष्वक्तः पूजितश्च यथाविधि ॥ ७ ॥ धनं चास्मै ददुर्भूरि प्रीयमाणा महारथाः । उन सब लोगोंने प्रेमवश उसे छातीसे लगा लिया और उसका यथोचित सत्कार किया। इतना ही नहीं, बभ्रुवाहनपर प्रसन्न हुए उन पाण्डव महारथियोंने उसे बहुत धन दिया ॥ ७ १/२ ॥ तथैव च महीपालः कृष्णं चक्रगदाधरम् ॥ ८ ॥ प्रद्युम्न इव गोविन्दं विनयेनोपतस्थिवान् । इसी प्रकार वह भूपाल प्रद्युम्नकी भाँति विनीत भावसे शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ ८ १/२ ॥ तस्मै कृष्णो ददौ राज्ञे महार्हमतिपूजितम् ॥ ९ ॥ रथं हेमपरिष्कारं दिव्याश्वयुजमुत्तमम् । श्रीकृष्णने इस राजाको एक बहुमूल्य रथ प्रदान किया जो सुनहरी साजोंसे सुसज्जित, सबके द्वारा अत्यन्त प्रशंसित और उत्तम था। उसमें दिव्य घोड़े जुते हुए थे ॥ ९ १/२ ॥ धर्मराजश्च भीमश्च फाल्गुनश्च यमौ तथा ॥ १० ॥ पृथक् पृथक् च ते चैनं मानार्थाभ्यामयोजयन् ।

तत्पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवने अलग-अलग बभ्रुवाहनका सत्कार करके उसे बहुत धन दिया ॥ १० १/२ ॥ ततस्तृतीये दिवसे सत्यवत्यात्मजो मुनिः ॥ ११ ॥ युधिष्ठिरं समभ्येत्य वाग्मी वचनमब्रवीत् । उसके तीसरे दिन सत्यवतीनन्दन प्रवचनकुशल महर्षि व्यास युधिष्ठिरके पास आकर बोले— ॥ ११ १/२ ॥ अद्यप्रभृति कौन्तेय यजस्व समयो हि ते । मुहूर्तो यज्ञियः प्राप्तश्चोदयन्तीह याजकाः ॥ १२ ॥ 'कुन्तीनन्दन! तुम आजसे यज्ञ आरम्भ कर दो। उसका समय आ गया है। यज्ञका शुभ मुहूर्त उपस्थित है और याजकगण तुम्हें बुला रहे हैं ॥ १२ ॥ अहीनो नाम राजेन्द्र क्रतुस्तेऽयं च कल्पताम् । बहुत्वात् काञ्चनाख्यस्य ख्यातो बहुसुवर्णकः ॥ १३ ॥ 'राजेन्द्र! तुम्हारे इस यज्ञमें किसी बातकी कमी नहीं रहेगी। इसलिये यह किसी भी अंगसे हीन न होनेके कारण अहीन (सर्वांगपूर्ण) कहलायेगा। इसमें सुवर्ण नामक द्रव्यकी अधिकता होगी; इसलिये यह बहुसुवर्णक नामसे विख्यात होगा ॥ १३ ॥ एवमत्र महाराज दक्षिणां त्रिगुणां कुरु । त्रित्वं व्रजतु ते राजन् ब्राह्मणा ह्यत्र कारणम् ॥ १४ ॥ 'महाराज! यज्ञके प्रधान कारण ब्राह्मण ही हैं; इसलिये तुम उन्हें तिगुनी दक्षिणा देना। ऐसा करनेसे तुम्हारा यह एक ही यज्ञ तीन यज्ञोंके समान हो जायगा ॥ १४ ॥ त्रीनश्वमेधानत्र त्वं सम्प्राप्य बहुदक्षिणान् । ज्ञातिवध्याकृतं पापं प्रहास्यसि नराधिप ॥ १५ ॥ 'नरेश्वर! यहाँ बहुत-सी दक्षिणावाले तीन अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाकर तुम ज्ञातिवधके पापसे मुक्त हो जाओगे ॥ १५ ॥ पवित्रं परमं चैतत् पावनं चैतदुत्तमम् । यदाश्वमेधावभृथं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ॥ १६ ॥ 'कुरुनन्दन! तुम्हें जो अश्वमेध-यज्ञका अवभृथ-स्नान प्राप्त होगा, वह परम पवित्र, पावन और उत्तम है' ॥ १६ ॥ इत्युक्तः स तु तेजस्वी व्यासेनामितबुद्धिना । दीक्षां विवेश धर्मात्मा वाजिमेधाप्तये ततः ॥ १७ ॥ परम बुद्धिमान् व्यासजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा एवं तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने अश्वमेध-यज्ञकी सिद्धिके लिये उसी दिन दीक्षा ग्रहण की ॥ १७ ॥ ततो यज्ञं महाबाहुर्वाजिमेधं महाक्रतुम् । बह्वन्नदक्षिणं राजा सर्वकामगुणान्वितम् ॥ १८ ॥

फिर उन महाबाहु नरेशने बहुत-से अन्नकी दक्षिणासे युक्त तथा सम्पूर्ण कामना और गुणोंसे सम्पन्न उस अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान आरम्भ कर दिया ॥ १८ ॥ तत्र वेदविदो राजंश्चक्रुः कर्माणि याजकाः । परिक्रमन्तः सर्वज्ञा विधिवत् साधुशिक्षितम् ॥ १९ ॥ उसमें वेदोंके ज्ञाता और सर्वज्ञ याजकोंने सम्पूर्ण कर्म किये-कराये। वे सब ओर घूम- घूमकर सत्पुरुषों-द्वारा शिक्षित कर्मका सम्पादन करते-कराते थे ॥ १९ ॥ न तेषां स्खलितं किंचिदासीच्चाप्यकृतं तथा । क्रममुक्तं च युक्तं च चक्रुस्तत्र द्विजर्षभाः ॥ २० ॥ उनके द्वारा उस यज्ञमें कहीं भी कोई भूल या त्रुटि नहीं होने पायी। कोई भी कर्म न तो छूटा और न अधूरा रहा। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने प्रत्येक कार्यको क्रमके अनुसार उचित रीतिसे पूरा किया ॥ २० ॥ कृत्वा प्रवर्ग्यं धर्माख्यं यथावद् द्विजसत्तमाः । चक्रुस्ते विधिवद् राजंस्तथैवाभिषवं द्विजाः ॥ २१ ॥ राजन्! वहाँ ब्राह्मणशिरोमणियोंने प्रवर्ग्य नामक धर्मानुकूल कर्मको यथोचित रीतिसे सम्पन्न करके विधिपूर्वक सोमाभिषव—सोमलताका रस निकालनेका कार्य किया ॥ २१ ॥ अभिषूय ततो राजन् सोमं सोमपसत्तमाः । सवनान्यानुपूर्व्येण चक्रुः शास्त्रानुसारिणः ॥ २२ ॥ महाराज! सोमपान करनेवालोंमें श्रेष्ठ तथा शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले विद्वानोंने सोमरस निकालकर उसके द्वारा क्रमशः तीनों समयके सवन कर्म किये ॥ २२ ॥ न तत्र कृपणः कश्चिन्न दरिद्रो बभूव ह । क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानवः ॥ २३ ॥ उस यज्ञमें आया हुआ कोई भी मनुष्य, चाहे वह निम्न-से-निम्न श्रेणीका क्यों न हो, दीन-दरिद्र, भूखा अथवा दुखिया नहीं रह गया था ॥ २३ ॥ भोजनं भोजनार्थिभ्यो दापयामास शत्रुहा । भीमसेनो महातेजाः सततं राजशासनात् ॥ २४ ॥ शत्रुसूदन महातेजस्वी भीमसेन महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भोजनार्थियोंको भोजन दिलानेके कामपर सदा डटे रहते थे ॥ २४ ॥ संस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकार्याणि याजकाः । दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रानुदर्शनात् ॥ २५ ॥ यज्ञकी वेदी बनानेमें निपुण याजकगण प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिके अनुसार सब कार्य सम्पन्न किया करते थे ॥ २५ ॥ नाषडङ्गविदत्रासीत् सदस्यस्तस्य धीमतः । नाव्रतो नानुपाध्यायो न च वादाविचक्षणः ॥ २६ ॥

बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरके यज्ञका कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था जो छहों अंगोंका विद्वान्, ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाला, अध्यापनकर्ममें कुशल तथा वाद-विवादमें प्रवीण न हो ॥ २६ ॥ ततो यूपोच्छ्रये प्राप्ते षड् बैल्वान् भरतर्षभ । खादिरान् बिल्वसंमितांस्तावत् सर्ववर्णिनः ॥ २७ ॥ देवदारुमयौ द्वौ तु यूपौ कुरुपतेर्मखे । श्लेष्मातकमयं चैकं याजकाः समकल्पयन् ॥ २८ ॥ भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् जब यूपकी स्थापनाका समय आया, तब याजकोंने यज्ञभूमिमें बेलके छः, खैरके छः, पलाशके भी छः, देवदारुके दो और लसोड़ेका एक—इस प्रकार इक्कीस यूप कुरुराज युधिष्ठिरके यज्ञमें खड़े किये ॥ २७-२८ ॥ शोभार्थं चापरान् यूपान् काञ्चनान् भरतर्षभ । स भीमः कारयामास धर्मराजस्य शासनात् ॥ २९ ॥ भरतभूषण! इनके सिवा धर्मराजकी आज्ञासे भीमसेनने यज्ञकी शोभाके लिये और भी बहुत-से सुवर्णमय यूप खड़े कराये ॥ २९ ॥ ते व्यराजन्त राजर्षेर्वासोभिरुपशोभिताः । महेन्द्रानुगता देवा यथा सप्तर्षिभिर्दिवि ॥ ३० ॥ वस्त्रोंद्वारा अलंकृत किये गये वे राजर्षि युधिष्ठिरके यज्ञ सम्बन्धी यूप आकाशमें सप्तर्षियोंसे घिरे हुए इन्द्रके अनुगामी देवताओंके समान शोभा पाते थे ॥ ३० ॥ इष्टकाः काञ्चनीश्चात्र चयनार्थं कृताऽभवन् । शुशुभे चयनं तच्च दक्षस्येव प्रजापतेः ॥ ३१ ॥ यज्ञकी वेदी बनानेके लिये वहाँ सोनेकी ईंटें तैयार करायी गयी थीं। उनके द्वारा जब वेदी बनकर तैयार हुई तब वह दक्षप्रजापतिकी यज्ञवेदीके समान शोभा पाने लगी ॥ ३१ ॥ चतुश्चित्यश्च तस्यासीदष्टादशकरात्मकः । स रुक्मपक्षो निचितस्त्रिकोणो गरुडाकृतिः ॥ ३२ ॥ उस यज्ञमण्डपमें अग्निचयनके लिये चार स्थान बने थे। उनमेंसे प्रत्येककी लम्बाई- चौड़ाई अठारह हाथकी थी। प्रत्येक वेदी सुवर्णमय पंखसे युक्त एवं गरुड़के समान आकारवाली थी। वह त्रिकोणाकार बनायी गयी थी ॥ ३२ ॥ ततो नियुक्ताः पशवो यथाशास्त्रं मनीषिभिः । तं तं देवं समुद्दिश्य पक्षिणः पशवश्च ये ॥ ३३ ॥ ऋषभाः शास्त्रपठितास्तथा जलचराश्च ये । सर्वांस्तानभ्ययुञ्जंस्ते तत्राग्निचयकर्मणि ॥ ३४ ॥ तदनन्तर मनीषी पुरुषोंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पशुओंको नियुक्त किया। भिन्न- भिन्न देवताओंके उद्देश्यसे पशु-पक्षी, शास्त्रकथित वृषभ और जलचर जन्तु—इन सबका