अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफिर उन महाबाहु नरेशने बहुत-से अन्नकी दक्षिणासे युक्त तथा सम्पूर्ण कामना और गुणोंसे सम्पन्न उस अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान आरम्भ कर दिया ॥ १८ ॥ तत्र वेदविदो राजंश्चक्रुः कर्माणि याजकाः । परिक्रमन्तः सर्वज्ञा विधिवत् साधुशिक्षितम् ॥ १९ ॥ उसमें वेदोंके ज्ञाता और सर्वज्ञ याजकोंने सम्पूर्ण कर्म किये-कराये। वे सब ओर घूम- घूमकर सत्पुरुषों-द्वारा शिक्षित कर्मका सम्पादन करते-कराते थे ॥ १९ ॥ न तेषां स्खलितं किंचिदासीच्चाप्यकृतं तथा । क्रममुक्तं च युक्तं च चक्रुस्तत्र द्विजर्षभाः ॥ २० ॥ उनके द्वारा उस यज्ञमें कहीं भी कोई भूल या त्रुटि नहीं होने पायी। कोई भी कर्म न तो छूटा और न अधूरा रहा। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने प्रत्येक कार्यको क्रमके अनुसार उचित रीतिसे पूरा किया ॥ २० ॥ कृत्वा प्रवर्ग्यं धर्माख्यं यथावद् द्विजसत्तमाः । चक्रुस्ते विधिवद् राजंस्तथैवाभिषवं द्विजाः ॥ २१ ॥ राजन्! वहाँ ब्राह्मणशिरोमणियोंने प्रवर्ग्य नामक धर्मानुकूल कर्मको यथोचित रीतिसे सम्पन्न करके विधिपूर्वक सोमाभिषव—सोमलताका रस निकालनेका कार्य किया ॥ २१ ॥ अभिषूय ततो राजन् सोमं सोमपसत्तमाः । सवनान्यानुपूर्व्येण चक्रुः शास्त्रानुसारिणः ॥ २२ ॥ महाराज! सोमपान करनेवालोंमें श्रेष्ठ तथा शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले विद्वानोंने सोमरस निकालकर उसके द्वारा क्रमशः तीनों समयके सवन कर्म किये ॥ २२ ॥ न तत्र कृपणः कश्चिन्न दरिद्रो बभूव ह । क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानवः ॥ २३ ॥ उस यज्ञमें आया हुआ कोई भी मनुष्य, चाहे वह निम्न-से-निम्न श्रेणीका क्यों न हो, दीन-दरिद्र, भूखा अथवा दुखिया नहीं रह गया था ॥ २३ ॥ भोजनं भोजनार्थिभ्यो दापयामास शत्रुहा । भीमसेनो महातेजाः सततं राजशासनात् ॥ २४ ॥ शत्रुसूदन महातेजस्वी भीमसेन महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भोजनार्थियोंको भोजन दिलानेके कामपर सदा डटे रहते थे ॥ २४ ॥ संस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकार्याणि याजकाः । दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रानुदर्शनात् ॥ २५ ॥ यज्ञकी वेदी बनानेमें निपुण याजकगण प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिके अनुसार सब कार्य सम्पन्न किया करते थे ॥ २५ ॥ नाषडङ्गविदत्रासीत् सदस्यस्तस्य धीमतः । नाव्रतो नानुपाध्यायो न च वादाविचक्षणः ॥ २६ ॥