भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

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बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरके यज्ञका कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था जो छहों अंगोंका विद्वान्, ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाला, अध्यापनकर्ममें कुशल तथा वाद-विवादमें प्रवीण न हो ॥ २६ ॥ ततो यूपोच्छ्रये प्राप्ते षड् बैल्वान् भरतर्षभ । खादिरान् बिल्वसंमितांस्तावत् सर्ववर्णिनः ॥ २७ ॥ देवदारुमयौ द्वौ तु यूपौ कुरुपतेर्मखे । श्लेष्मातकमयं चैकं याजकाः समकल्पयन् ॥ २८ ॥ भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् जब यूपकी स्थापनाका समय आया, तब याजकोंने यज्ञभूमिमें बेलके छः, खैरके छः, पलाशके भी छः, देवदारुके दो और लसोड़ेका एक—इस प्रकार इक्कीस यूप कुरुराज युधिष्ठिरके यज्ञमें खड़े किये ॥ २७-२८ ॥ शोभार्थं चापरान् यूपान् काञ्चनान् भरतर्षभ । स भीमः कारयामास धर्मराजस्य शासनात् ॥ २९ ॥ भरतभूषण! इनके सिवा धर्मराजकी आज्ञासे भीमसेनने यज्ञकी शोभाके लिये और भी बहुत-से सुवर्णमय यूप खड़े कराये ॥ २९ ॥ ते व्यराजन्त राजर्षेर्वासोभिरुपशोभिताः । महेन्द्रानुगता देवा यथा सप्तर्षिभिर्दिवि ॥ ३० ॥ वस्त्रोंद्वारा अलंकृत किये गये वे राजर्षि युधिष्ठिरके यज्ञ सम्बन्धी यूप आकाशमें सप्तर्षियोंसे घिरे हुए इन्द्रके अनुगामी देवताओंके समान शोभा पाते थे ॥ ३० ॥ इष्टकाः काञ्चनीश्चात्र चयनार्थं कृताऽभवन् । शुशुभे चयनं तच्च दक्षस्येव प्रजापतेः ॥ ३१ ॥ यज्ञकी वेदी बनानेके लिये वहाँ सोनेकी ईंटें तैयार करायी गयी थीं। उनके द्वारा जब वेदी बनकर तैयार हुई तब वह दक्षप्रजापतिकी यज्ञवेदीके समान शोभा पाने लगी ॥ ३१ ॥ चतुश्चित्यश्च तस्यासीदष्टादशकरात्मकः । स रुक्मपक्षो निचितस्त्रिकोणो गरुडाकृतिः ॥ ३२ ॥ उस यज्ञमण्डपमें अग्निचयनके लिये चार स्थान बने थे। उनमेंसे प्रत्येककी लम्बाई- चौड़ाई अठारह हाथकी थी। प्रत्येक वेदी सुवर्णमय पंखसे युक्त एवं गरुड़के समान आकारवाली थी। वह त्रिकोणाकार बनायी गयी थी ॥ ३२ ॥ ततो नियुक्ताः पशवो यथाशास्त्रं मनीषिभिः । तं तं देवं समुद्दिश्य पक्षिणः पशवश्च ये ॥ ३३ ॥ ऋषभाः शास्त्रपठितास्तथा जलचराश्च ये । सर्वांस्तानभ्ययुञ्जंस्ते तत्राग्निचयकर्मणि ॥ ३४ ॥ तदनन्तर मनीषी पुरुषोंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पशुओंको नियुक्त किया। भिन्न- भिन्न देवताओंके उद्देश्यसे पशु-पक्षी, शास्त्रकथित वृषभ और जलचर जन्तु—इन सबका