भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 421 में से

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अग्निस्थापन-कर्ममें याजकोंने उपयोग किया ।। यूपेषु नियता चासीत् पशूनां त्रिशती तथा । अश्वरत्नोत्तरा यज्ञे कौन्तेयस्य महात्मनः ।। ३५ ।। कुन्तीनन्दन महात्मा युधिष्ठिरके उस यज्ञमें जो यूप खड़े किये गये थे, उनमें तीन सौ पशु बाँधे गये थे। उन सबमें प्रधान वही अश्वरत्न था ।। ३५ ।। स यज्ञः शुशुभे तस्य साक्षाद् देवर्षिसंकुलः । गन्धर्वगणसंगीतः प्रनृत्तोऽप्सरसां गणैः ।। ३६ ।। साक्षात् देवर्षियोंसे भरा हुआ युधिष्ठिरका वह यज्ञ बड़ी शोभा पा रहा था। गन्धर्वोंके मधुर संगीत और अप्सराओंके नृत्यसे उसकी शोभा और बढ़ गयी थी ।। ३६ ।। स किंपुरुषसंकीर्णः किंनरैश्चोपशोभितः । सिद्धविप्रनिवासैश्च समन्तादभिसंवृतः ।। ३७ ।। वह यज्ञमण्डप किम्पुरुषोंसे भरा-पूरा था। किन्नर भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके चारों ओर सिद्धों और ब्राह्मणोंके निवासस्थान बने थे, जिनसे वह यज्ञ-मण्डप घिरा था ।। ३७ ।। तस्मिन् सदसि नित्यास्तु व्यासशिष्या द्विजर्षभाः । सर्वशास्त्रप्रणेतारः कुशला यज्ञसंस्तरे ।। ३८ ।। व्यासजीके शिष्य श्रेष्ठ ब्राह्मण उस यज्ञसभामें सदा उपस्थित रहते थे। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके प्रणेता और यज्ञकर्ममें कुशल थे ।। ३८ ।। नारदश्च बभूवात्र तुम्बुरुश्च महाद्युतिः । विश्वावसुश्चित्रसेनस्तथान्ये गीतकोविदाः ।। ३९ ।। गन्धर्वा गीतकुशला नृत्येषु च विशारदाः । रमयन्ति स्म तान् विप्रान् यज्ञकर्मान्तरेषु वै ।। ४० ।। नारद, महातेजस्वी तुम्बुरु, विश्वावसु, चित्रसेन तथा अन्य संगीतकलाकोविद, गाननिपुण एवं नृत्यविशारद गन्धर्व प्रतिदिन यज्ञकार्यके बीच-बीचमें समय मिलनेपर अपनी नाच-गानकी कलाओंद्वारा उन ब्राह्मणोंका मनोरंजन करते थे ।। ३९-४० ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे अष्टाशीतितमोऽध्यायः ।। ८८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधयज्ञका आरम्भविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८८ ।।

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