भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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एकोननवतितमोऽध्यायः युधिष्ठिरका ब्राह्मणोंको दक्षिणा देना और राजाओंको भेंट देकर विदा करना वैशम्पायन उवाच श्रपयित्वा पशूनन्यान् विधिवद् द्विजसत्तमाः । तं तुरङ्गं यथाशास्त्रमालभन्त द्विजातयः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने अन्यान्य पशुओंका विधिपूर्वक श्रपण करके उस अश्वका भी शास्त्रीय विधिके अनुसार आलभन किया ॥ १ ॥ ततः संश्रप्य तुरगं विधिवद् याजकास्तदा । उपसंवेशयन् राजंस्ततस्तां द्रुपदात्मजाम् ॥ २ ॥ कलाभिस्तिसृभी राजन् यथाविधि मनस्विनीम् । राजन्! तत्पश्चात् याजकोंने विधिपूर्वक अश्वका श्रपण करके उसके समीप मन्त्र, द्रव्य और श्रद्धा—इन तीन कलाओंसे युक्त मनस्विनी द्रौपदीको शास्त्रोक्त विधिके अनुसार बैठाया ॥ २ १/२ ॥ उद्धृत्य तु वपां तस्य यथाशास्त्रं द्विजातयः ॥ ३ ॥ श्रपयामासुरव्यग्रा विधिवद् भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! इसके बाद ब्राह्मणोंने शान्तचित्त होकर उस अश्वकी चर्बी निकाली और उसका विधिपूर्वक श्रपण करना आरम्भ किया ॥ ३ १/२ ॥ तं वपाधूमगन्धं तु धर्मराजः सहानुजैः ॥ ४ ॥ उपाजिघ्रद् यथाशास्त्रं सर्वपापापहं तदा । भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार उस चर्बीके धूमकी गन्ध सूँघी, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाली थी ॥ ४ १/२ ॥ शिष्टान्यङ्गानि यान्यासंस्तस्याश्वस्य नराधिप ॥ ५ ॥ तान्यग्नौ जुहुवुर्धीराः समस्ताः षोडशर्त्विजः । नरेश्वर! उस अश्वके जो शेष अंग थे, उनको धीर स्वभाववाले समस्त सोलह ऋत्विजोंने अग्निमें होम कर दिया ॥ ५ १/२ ॥ संस्थाप्यैवं तस्य राजंस्तं यज्ञं शक्रतेजसः ॥ ६ ॥ व्यासः सशिष्यो भगवान् वर्धयामास तं नृपम् । इस प्रकार इन्द्रके समान तेजस्वी राजा युधिष्ठिरके उस यज्ञको समाप्त करके शिष्योंसहित भगवान् व्यासने उन्हें बधाई दी—अभ्युदयसूचक आशीर्वाद दिया ॥ ६ १/२ ॥