भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

३. इन्द्रिय-संयम, पञ्च-प्राण विचार व मनो-निरोध

कुरुकुलनन्दन! उस समय कृतार्थ होकर उस शिष्यने वह ब्रह्मपद प्राप्त किया, जहाँ जाकर शोक नहीं करना पड़ता ॥ ४४ ॥ अर्जुन उवाच को न्वसौ ब्राह्मणः कृष्ण कश्च शिष्यो जनार्दन । श्रोतव्यं चेन्मयैतद् वै तत्त्वमाचक्ष्व मे विभो ॥ ४५ ॥ अर्जुनने पूछा—जनार्दन श्रीकृष्ण! वे ब्रह्मनिष्ठ गुरु कौन थे और शिष्य कौन थे? प्रभो! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो ठीक-ठीक बतानेकी कृपा कीजिये ॥ ४५ ॥ वासुदेव उवाच अहं गुरुर्महाबाहो मनः शिष्यं च विद्धि मे । त्वत्प्रीतया गुह्यमेतच्च कथितं ते धनंजय ॥ ४६ ॥ श्रीकृष्णने कहा—महाबाहो! मैं ही गुरु हूँ और मेरे मनको ही शिष्य समझो। धनंजय! तुम्हारे स्नेहवश मैंने इस गोपनीय रहस्यका वर्णन किया है ॥ ४६ ॥ मयि चेदस्ति ते प्रीतिर्नित्यं कुरुकुलोद्वह । अध्यात्ममेतच्छ्रुत्वा त्वं सम्यगाचर सुव्रत ॥ ४७ ॥ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुरुकुलनन्दन! यदि मुझपर तुम्हारा प्रेम हो तो इस अध्यात्मज्ञानको सुनकर तुम नित्य इसका यथावत् पालन करो ॥ ४७ ॥ ततस्त्वं सम्यगाचीर्णे धर्मेऽस्मिन्नरिकर्षण । सर्वपापविनिर्मुक्तो मोक्षं प्राप्स्यसि केवलम् ॥ ४८ ॥ शत्रुदमन! इस धर्मका पूर्णतया आचरण करनेपर तुम समस्त पापोंसे छूटकर विशुद्ध मोक्षको प्राप्त कर लोगे ॥ ४८ ॥ पूर्वमप्येतदेवोक्तं युद्धकाल उपस्थिते । मया तव महाबाहो तस्मादत्र मनः कुरु ॥ ४९ ॥ महाबाहो! पहले भी मैंने युद्धकाल उपस्थित होनेपर यही उपदेश तुमको सुनाया था। इसलिये तुम इसमें मन लगाओ ॥ ४९ ॥ मया तु भरतश्रेष्ठ चिरदृष्टः पिता प्रभुः । तमहं द्रष्टुमिच्छामि सम्मते तव फाल्गुन ॥ ५० ॥ भरतश्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं पिताजीका दर्शन करना चाहता हूँ। उन्हें देखे बहुत दिन हो गये। यदि तुम्हारी राय हो तो मैं उनके दर्शनके लिये द्वारका जाऊँ ॥ ५० ॥ वैशम्पायन उवाच इत्युक्तवचनं कृष्णं प्रत्युवाच धनंजयः । गच्छावो नगरं कृष्ण गजसाह्वयमद्य वै ॥ ५१ ॥

समेत्य तत्र राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । समनुज्ञाप्य राजानं स्वां पुरीं यातुमर्हसि ॥ ५२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! भगवान् श्रीकृष्णकी बात सुनकर अर्जुनने कहा —'श्रीकृष्ण! अब हमलोग यहाँसे हस्तिनापुरको चलें। वहाँ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरसे मिलकर और उनकी आज्ञा लेकर आप अपनी पुरीको पधारें' ॥ ५१-५२ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरुशिष्यसंवादविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥

द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः श्रीकृष्णका अर्जुनके साथ हस्तिनापुर जाना और वहाँ सबसे मिलकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले सुभद्राके साथ द्वारकाको प्रस्थान करना वैशम्पायन उवाच ततोऽभ्यनोदयत् कृष्णो युज्यतामिति दारुकम् । मुहूर्तादिव चाचष्ट युक्तमित्येव दारुकः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने दारुकको आज्ञा दी कि ‘रथ जोतकर तैयार करो।’ दारुकने दो ही घड़ीमें लौटकर सूचना दी कि ‘रथ जुत गया’ ॥ १ ॥ तथैव चानुयात्रादि चोदयामास पाण्डवः । सज्जयध्वं प्रयास्यामो नगरं गजसाह्वयम् ॥ २ ॥ इसी प्रकार अर्जुनने भी अपने सेवकोंको आदेश दिया कि ‘सब लोग रथको सुसज्जित करो। अब हमें हस्तिनापुरकी यात्रा करनी है’ ॥ २ ॥ इत्युक्ताः सैनिकास्ते तु सज्जीभूता विशाम्पते । आचख्युः सज्जमित्येवं पार्थायामिततेजसे ॥ ३ ॥ प्रजानाथ! आज्ञा पाते ही सम्पूर्ण सैनिक तैयार हो गये और महान् तेजस्वी अर्जुनके पास जाकर बोले—‘रथ सुसज्जित है और यात्राकी सारी तैयारी हो गयी’ ॥ ततस्तौ रथमास्थाय प्रयातौ कृष्णपाण्डवौ । विकुर्वाणौ कथाश्चित्राः प्रीयमाणौ विशाम्पते ॥ ४ ॥ राजन्! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन रथपर बैठकर आपसमें तरह-तरहकी विचित्र बातें करते हुए प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे चल दिये ॥ ४ ॥ रथस्थं तु महातेजा वासुदेवं धनंजयः । पुनरेवाब्रवीद् वाक्यमिदं भरतसत्तम ॥ ५ ॥ भरतभूषण! रथपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार महातेजस्वी अर्जुन बोले— ॥ ५ ॥ त्वत्प्रसादाज्जयः प्राप्तो राज्ञा वृष्णिकुलोद्वह । नियताः शत्रवश्चापि प्राप्तं राज्यमकण्टकम् ॥ ६ ॥ ‘वृष्णिकुलधुरन्धर श्रीकृष्ण! आपकी कृपासे ही राजा युधिष्ठिरको विजय प्राप्त हुई है। उनके शत्रुओंका दमन हो गया और उन्हें निष्कण्टक राज्य मिला ॥ ६ ॥

नाथवन्तश्च भवता पाण्डवा मधुसूदन । भवन्तं प्लवमासाद्य तीर्णाः स्म कुरुसागरम् ॥ ७ ॥ 'मधुसूदन! हम सभी पाण्डव आपसे सनाथ हैं, आपको ही नौकारूप पाकर हमलोग कौरवसेनारूपी समुद्रसे पार हुए हैं ॥ ७ ॥ विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसत्तम । तथा त्वामभिजानामि यथा चाहं भवन्मतः ॥ ८ ॥ विश्वकर्मन्! आपको नमस्कार है। विश्वात्मन्! आप सम्पूर्ण विश्वमें सबसे श्रेष्ठ हैं। मैं आपको उसी तरह जानता हूँ, जिस तरह आप मुझे समझते हैं ॥ ८ ॥ त्वत्तेजः सम्भवो नित्यं भूतात्मा मधुसूदन । रतिः क्रीडामयी तुभ्यं माया ते रोदसी विभो ॥ ९ ॥ 'मधुसूदन! आपके ही तेजसे सदा सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति होती है। आप ही सब प्राणियोंके आत्मा हैं। प्रभो! नाना प्रकारकी लीलाएँ आपकी रति (मनोरंजन) हैं। आकाश और पृथिवी आपकी माया है ॥ ९ ॥ त्वयि सर्वमिदं विश्वं यदिदं स्थाणु जङ्गमम् । त्वं हि सर्वं विकुरुषे भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ १० ॥ 'यह जो स्थावर-जंगमरूप जगत् है, सब आपहीमें प्रतिष्ठित है। आप ही चार प्रकारके समस्त प्राणिसमुदायकी सृष्टि करते हैं ॥ १० ॥ पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव मधुसूदन । हसितं तेऽमला ज्योत्स्ना ऋतवश्चेन्द्रियाणि ते ॥ ११ ॥ 'मधुसूदन! पृथ्वी, अन्तरिक्ष और आकाशकी सृष्टि भी आपने ही की है। निर्मल चाँदनी आपका हास्य है और ऋतुएँ आपकी इन्द्रियाँ हैं ॥ ११ ॥ प्राणो वायुः सततगः क्रोधो मृत्युः सनातनः । प्रसादे चापि पद्मा श्रीर्नित्यं त्वयि महामते ॥ १२ ॥ 'सदा चलनेवाली वायु प्राण है, क्रोध सनातन मृत्यु है। महामते! आपके प्रसादमें लक्ष्मी विराजमान हैं। आपके वक्षःस्थलमें सदा ही श्रीजीका निवास है ॥ १२ ॥ रतिस्तुष्टिर्धृतिः क्षान्तिर्मतिः कान्तिश्चराचरम् । त्वमेवेह युगान्तेषु निधनं प्रोच्यसेऽनघ ॥ १३ ॥ 'अनघ! आपमें ही रति, तुष्टि, धृति, क्षान्ति, मति, कान्ति और चराचर जगत् है। आप ही युगान्तकालमें प्रलय कहे जाते हैं ॥ १३ ॥ सुदीर्घेणापि कालेन न ते शक्या गुणा मया । आत्मा च परमात्मा च नमस्ते नलिनेक्षण ॥ १४ ॥ 'दीर्घकालतक गणना करनेपर भी आपके गुणोंका पार पाना असम्भव है। आप ही आत्मा और परमात्मा हैं। कमलनयन! आपको नमस्कार है ॥ १४ ॥

विदितो मे सुदुर्धर्ष नारदाद् देवलात् तथा । कृष्णद्वैपायनाच्चैव तथा कुरुपितामहात् ॥ १५ ॥ 'दुर्धर्ष परमेश्वर! मैंने देवर्षि नारद, देवल, श्रीकृष्णद्वैपायन तथा पितामह भीष्मके मुखसे आपके माहात्म्यका ज्ञान प्राप्त किया है ॥ १५ ॥ त्वयि सर्वं समासक्तं त्वमेवैको जनेश्वरः । यच्चानुग्रहसंयुक्तमेतदुक्तं त्वयानघ ॥ १६ ॥ एतत् सर्वमहं सम्यगाचरिष्ये जनार्दन । 'सारा जगत् आपमें ही ओत-प्रोत है। एकमात्र आप ही मनुष्योंके अधीश्वर हैं। निष्पाप जनार्दन! आपने मुझपर कृपा करके जो यह उपदेश दिया है, उसका मैं यथावत् पालन करूँगा ॥ १६ १/२ ॥ इदं चाद्भुतमत्यन्तं कृतमस्मत्प्रियेप्सया ॥ १७ ॥ यत्पापो निहतः संख्ये कौरव्यो धृतराष्ट्रजः । 'हमलोगोंका प्रिय करनेकी इच्छासे आपने यह अत्यन्त अद्भुत कार्य किया कि धृतराष्ट्रके पुत्र कुरुकुलकलंक पापी दुर्योधनको (भैया भीमके द्वारा) युद्धमें मरवा डाला ॥ १७ १/२ ॥ त्वया दग्धं हि तत्सैन्यं मया विजितमाहवे ॥ १८ ॥ भवता तत्कृतं कर्म येनावाप्तो जयो मया । 'शत्रुकी सेनाको आपने ही अपने तेजसे दग्ध कर दिया था। तभी मैंने युद्धमें उसपर विजय पायी है। आपने ही ऐसे-ऐसे उपाय किये हैं, जिनसे मुझे विजय सुलभ हुई है ॥ १८ १/२ ॥ दुर्योधनस्य संग्रामे तव बुद्धिपराक्रमैः ॥ १९ ॥ कर्णस्य च वधोपायो यथावत् सम्प्रदर्शितः । सैन्धवस्य च पापस्य भूरिश्रवस एव च ॥ २० ॥ 'संग्राममें आपकी ही बुद्धि और पराक्रमसे दुर्योधन, कर्ण, पापी सिन्धुराज जयद्रथ तथा भूरिश्रवाके वधका उपाय मुझे यथावत् रूपसे दृष्टिगोचर हुआ ॥ १९-२० ॥ अहं च प्रीयमाणेन त्वया देवकिनन्दन । यदुक्तस्तत् करिष्यामि न हि मेऽत्र विचारणा ॥ २१ ॥ 'देवकीनन्दन! आपने प्रेमपूर्वक प्रसन्नताके साथ मुझे जो कार्य करनेके लिये कहा है, उसे अवश्य करूँगा; इसमें मुझे कुछ भी विचार नहीं करना है ॥ २१ ॥ राजानं च समासाद्य धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । चोदयिष्यामि धर्मज्ञ गमनार्थं तवानघ ॥ २२ ॥ रुचितं हि ममैतत्त्वे द्वारकागमनं प्रभो । अचिरादेव द्रष्टा त्वं मातुलं मे जनार्दन ॥ २३ ॥

बलदेवं च दुर्धर्षं तथान्यान् वृष्णिपुङ्गवान् । 'धर्मज्ञ एवं निष्पाप भगवान् जनार्दन! मैं धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरके पास चलकर उनसे आपके जानेके लिये आज्ञा प्रदान करनेका अनुरोध करूँगा। इस समय आपका द्वारका जाना आवश्यक है, इसमें मेरी भी सम्मति है। अब आप शीघ्र ही मामाजीका दर्शन करेंगे और दुर्जय वीर बलदेवजी तथा अन्यान्य वृष्णिवंशी वीरोंसे मिल सकेंगे' ।। २२-२३ १/२ ।। एवं सम्भाषमाणौ तौ प्राप्तौ वारणसाह्वयम् ।। २४ ।। तथा विविशतुश्शोभौ सम्प्रहृष्टनराकुलम् । इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों मित्र हस्तिनापुरमें जा पहुँचे। उन दोनोंने हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए नगरमें प्रवेश किया ।। २४ १/२ ।। तौ गत्वा धृतराष्ट्रस्य गृहं शक्रगृहोपमम् ।। २५ ।। ददृशाते महाराज धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् । विदुरं च महाबुद्धिं राजानं च युधिष्ठिरम् ।। २६ ।। महाराज! इन्द्रभवनके समान शोभा पानेवाले धृतराष्ट्रके महलमें उन दोनोंने राजा धृतराष्ट्र, महाबुद्धिमान् विदुर और राजा युधिष्ठिरका दर्शन किया ।। २५-२६ ।। भीमसेनं च दुर्धर्षं माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । धृतराष्ट्रमुपासीनं युयुत्सुं चापराजितम् ।। २७ ।। गान्धारीं च महाप्रज्ञां पृथां कृष्णां च भामिनीम् । सुभद्राद्याश्च ताः सर्वा भरतानां स्त्रियस्तथा ।। २८ ।। ददृशाते स्त्रियः सर्वा गान्धारीपरिचारिकाः । फिर क्रमशः दुर्जय वीर भीमसेन, माद्रीनन्दन पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव, धृतराष्ट्रकी सेवामें लगे रहनेवाले अपराजित वीर युयुत्सु, परम बुद्धिमती गान्धारी, कुन्ती, भार्या द्रौपदी तथा सुभद्रा आदि भरतवंशकी सभी स्त्रियोंसे मिले। गान्धारीकी सेवामें रहनेवाली उन सभी स्त्रियोंका उन दोनोंने दर्शन किया ।। २७-२८ १/२ ।। ततः समेत्य राजानं धृतराष्ट्रमरिंदमौ ।। २९ ।। निवेद्य नामधेये स्वे तस्य पादावगृह्णताम् । गान्धार्याश्च पृथायाश्च धर्मराजस्य चैव हि ।। ३० ।। भीमस्य च महात्मानौ तथा पादावगृह्णताम् । सबसे पहले उन शत्रुदमन वीरोंने राजा धृतराष्ट्रके पास जाकर अपने नाम बताते हुए उनके दोनों चरणोंका स्पर्श किया। उसके बाद उन महात्माओंने गान्धारी, कुन्ती, धर्मराज युधिष्ठिर और भीमसेनके पैर छूये ।। २९-३० १/२ ।। क्षत्तारं चापि संगृह्य पृष्ट्वा कुशलमव्ययम् ।। ३१ ।। (परिष्वज्य महात्मानं वैश्यापुत्रं महारथम् ।) तैः सार्धं नृपतिं वृद्धं ततस्तौ पर्युपासताम् ।

फिर विदुरजीसे मिलकर उनका कुशल-मंगल पूछा। इसके बाद वैश्यापुत्र महारथी महामना युयुत्सुको भी हृदयसे लगाया। तत्पश्चात् उन सबके साथ वे दोनों बूढ़े राजा धृतराष्ट्रके पास जा बैठे ॥ ३१½ ॥ ततो निशि महाराजो धृतराष्ट्रः कुरूद्वहान् ॥ ३२ ॥ जनार्दनं च मेधावी व्यसर्जयत वै गृहान्। तेऽनुज्ञाता नृपतिना ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ॥ ३३ ॥ रात हो जानेपर मेधावी महाराज धृतराष्ट्रने उन कुरुश्रेष्ठ वीरों तथा भगवान् श्रीकृष्णको अपने-अपने घरमें जानेके लिये विदा किया। राजाकी आज्ञा पाकर वे सब लोग अपने-अपने घरको गये ॥ ३२-३३ ॥ धनंजयगृहानेव ययौ कृष्णस्तु वीर्यवान् । तत्रार्चितो यथान्यायं सर्वकामैरुपस्थितः ॥ ३४ ॥ पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनके ही घरमें गये। वहाँ उनकी यथोचित पूजा हुई और सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थ उनकी सेवामें उपस्थित किये गये ॥ ३४ ॥ कृष्णः सुष्वाप मेधावी धनंजयसहायवान् । प्रभातायां तु शर्वर्यां कृत्वा पौर्वाह्निकीं क्रियाम् ॥ ३५ ॥ धर्मराजस्य भवनं जग्मतुः परमार्चितौ । यत्रास्ते स सहामात्यो धर्मराजो महाबलः ॥ ३६ ॥ भोजनके पश्चात् मेधावी श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ सोये। जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब पूर्वाह्नकालकी क्रिया—संध्या-वन्दन आदि करके वे दोनों परम पूजित मित्र धर्मराज युधिष्ठिरके महलमें गये। जहाँ महाबली धर्मराज अपने मन्त्रियोंके साथ रहते थे ॥ ३५-३६ ॥ तौ प्रविश्य महात्मानौ तद् गृहं परमार्चितम् । धर्मराजं ददृशतुर्देवराजमिवाश्विनौ ॥ ३७ ॥ उस परम सुन्दर एवं सुसज्जित भवनमें प्रवेश करके उन महात्माओंने धर्मराज युधिष्ठिरका दर्शन किया। मानो दोनों अश्विनीकुमार देवराज इन्द्रसे आकर मिले हों ॥ ३७ ॥ समासाद्य तु राजानं वार्ष्णेयकुरुपुङ्गवौ । निषीदतुरुनुज्ञातौ प्रीयमाणेन तेन तौ ॥ ३८ ॥ श्रीकृष्ण और अर्जुन जब राजाके पास पहुँचे, तब उन्हें देख उनको बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर उनके आज्ञा देनेपर वे दोनों मित्र आसनपर विराजमान हुए ॥ ३८ ॥ ततः स राजा मेधावी विवक्षू प्रेक्ष्य तावुभौ । प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो वचनं राजसत्तमः ॥ ३९ ॥ तत्पश्चात् वक्ताओंमें श्रेष्ठ भूपालशिरोमणि मेधावी युधिष्ठिरने उन्हें कुछ कहनेके लिये इच्छुक देख उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३९ ॥

युधिष्ठिर उवाच विवक्षू हि युवां मन्ये वीरौ यदुकुरूद्वहौ । ब्रूतं कर्तास्मि सर्वं वां नचिरान्मा विचार्यताम् ।। ४० ।। युधिष्ठिर बोले—यदुकुल और कुरुकुलको अलंकृत करनेवाले वीरो! मालूम होता है, तुमलोग मुझसे कुछ कहना चाहते हो। जो भी कहना हो, कहो; मैं तुम्हारी सारी इच्छाओंको शीघ्र ही पूर्ण करूँगा। तुम मनमें कुछ अन्यथा विचार न करो ।। ४० ।। इत्युक्तः फाल्गुनस्तत्र धर्मराजानमब्रवीत् । विनीतवदुपागम्य वाक्यं वाक्यविशारदः ।। ४१ ।। उनके इस प्रकार कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल अर्जुनने धर्मराजके पास जाकर बड़े विनीत भावसे कहा— ।। ४१ ।। अयं चिरोषितो राजन् वासुदेवः प्रतापवान् । भवन्तं समनुज्ञाप्य पितरं द्रष्टुमिच्छति ।। ४२ ।। स गच्छेदभ्यनुज्ञातो भवता यदि मन्यसे । आनर्तनगरीं वीरस्तदनुज्ञातुमर्हसि ।। ४३ ।। ‘राजन्! परम प्रतापी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको यहाँ रहते बहुत दिन हो गया। अब ये आपकी आज्ञा लेकर अपने पिताजीका दर्शन करना चाहते हैं। यदि आप स्वीकार करें और हर्षपूर्वक आज्ञा दे दें तभी ये वीरवर श्रीकृष्ण आनर्तनगरी द्वारकाको जायँगे। अतः आप इन्हें जानेकी आज्ञा दे दें’ ।। ४२-४३ ।। युधिष्ठिर उवाच पुण्डरीकाक्ष भद्रं ते गच्छ त्वं मधुसूदन । पुरीं द्वारवतीमद्य द्रष्टुं शूरसुतं प्रभो ।। ४४ ।। युधिष्ठिरने कहा—कमलनयन मधुसूदन! आपका कल्याण हो। प्रभो! आप शूरनन्दन वसुदेवजीका दर्शन करनेके लिये आज ही द्वारकाको प्रस्थान कीजिये ।। ४४ ।। रोचते मे महाबाहो गमनं तव केशव । मातुलश्चिरदृष्टो मे त्वया देवी च देवकी ।। ४५ ।। महाबाहु केशव! मुझे आपका जाना इसलिये ठीक लगता है कि आपने मेरे मामाजी और मामी देवकी देवीको बहुत दिनोंसे नहीं देखा है ।। ४५ ।। समेत्य मातुलं गत्वा बलदेवं च मानद । पूजयेथा महाप्राज्ञ मद्वाक्येन यथार्हतः ।। ४६ ।। मानद! महाप्राज्ञ! आप मामाजी तथा भैया बलदेवजीके पास जाकर उनसे मिलिये और मेरी ओरसे उनका यथायोग्य सत्कार कीजिये ।। ४६ ।। स्मरेथाश्चापि मां नित्यं भीमं च बलिनां वरम् ।

फाल्गुनं सहदेवं च नकुलं चैव मानद ।। ४७ ।। भक्तोंको मान देनेवाले श्रीकृष्ण! द्वारकामें पहुँचकर आप मुझको, बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेनको, अर्जुन, सहदेव और नकुलको भी सदा याद रखियेगा ।। ४७ ।। आनर्तानवलोक्य त्वं पितरं च महाभुज । वृष्णींश्च पुनरागच्छेर्हयमेधे ममानघ ।। ४८ ।। महाबाहु निष्पाप श्रीकृष्ण! आनर्त देशकी प्रजा, अपने माता-पिता तथा वृष्णिवंशी बन्धु-बान्धवोंसे मिलकर पुनः मेरे अश्वमेध यज्ञमें पधारियेगा ।। ४८ ।। स गच्छ रत्नान्यादाय विविधानि वसूनि च । यच्चाप्यन्यन्मनोज्ञं ते तदप्यादत्स्व सात्वत ।। ४९ ।। इयं च वसुधा कृत्स्ना प्रसादात् तव केशव । अस्मानुपगता वीर निहताश्चापि शत्रवः ।। ५० ।। यदुनन्दन केशव! ये तरह-तरहके रत्न और धन प्रस्तुत हैं। इन्हें तथा दूसरी-दूसरी वस्तुएँ जो आपको पसंद हों लेकर यात्रा कीजिये। वीरवर! आपके प्रसादसे ही इस सम्पूर्ण भूमण्डलका राज्य हमारे हाथमें आया है और हमारे शत्रु भी मारे गये ।। ४९-५० ।। एवं ब्रुवति कौरव्ये धर्मराजे युधिष्ठिरे । वासुदेवो वरः पुंसामिदं वचनमब्रवीत् ।। ५१ ।। कुरुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर जब इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय पुरुषोत्तम वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने उनसे यह बात कही— ।। ५१ ।। तवैव रत्नानि धनं च केवलं धरा तु कृत्स्ना तु महाभुजाद्य वै । यदस्ति चान्यद् द्रविणं गृहे मम त्वमेव तस्येश्वर नित्यमीश्वरः ।। ५२ ।। ‘महाबाहो! ये रत्न, धन और समूची पृथ्वी अब केवल आपकी ही है। इतना ही नहीं, मेरे घरमें भी जो कुछ धन-वैभव है, उसको भी आप अपना ही समझिये। नरेश्वर! आप ही सदा उसके भी स्वामी हैं’ ।। ५२ ।। तथेत्यथोक्तः प्रतिपूजितस्तदा गदाग्रजो धर्मसुतेन वीर्यवान् । पितृष्वसारं त्ववदद् यथाविधि सम्पूजितश्चाप्यगमत् प्रदक्षिणम् ।। ५३ ।। उनके ऐसा कहनेपर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने जो आज्ञा कहकर उनके वचनोंका आदर किया। उनसे सम्मानित हो पराक्रमी श्रीकृष्णने अपनी बुआ कुन्तीके पास जाकर बातचीत की और उनसे यथोचित सत्कार पाकर उनकी प्रदक्षिणा की ।। ५३ ।। तया स सम्यक् प्रतिनन्दितस्तत-

स्तथैव सर्वैर्विदुरादिभिस्तथा । विनिर्ययौ नागपुराद् गदाग्रजो रथेन दिव्येन चतुर्भुजः स्वयम् ॥ ५४ ॥ कुन्तीसे भलीभाँति अभिनन्दित हो विदुर आदि सब लोगोंसे सत्कारपूर्वक विदा ले चार भुजाधारी भगवान् श्रीकृष्ण अपने दिव्य रथद्वारा हस्तिनापुरसे बाहर निकले ॥ ५४ ॥ रथे सुभद्रामधिरोप्य भाविनीं युधिष्ठिरस्यानुमते जनार्दनः । पितृष्वसुश्चापि तथा महाभुजो विनिर्ययौ पौरजनाभिसंवृतः ॥ ५५ ॥ बुआ कुन्ती तथा राजा युधिष्ठिरकी आज्ञासे भाविनी सुभद्राको भी रथपर बिठाकर महाबाहु जनार्दन पुरवासियोंसे घिरे हुए नगरसे बाहर निकले ॥ ५५ ॥ तमन्वयाद् वानरवर्यकेतनः ससात्यकिर्माद्रवतीसुतावपि । अगाधबुद्धिर्विदुरश्च माधवं स्वयं च भीमो गजराजविक्रमः ॥ ५६ ॥ उस समय उन माधवके पीछे कपिध्वज अर्जुन, सात्यकि, नकुल-सहदेव, अगाधबुद्धि विदुर और गजराजके समान पराक्रमी स्वयं भीमसेन भी कुछ दूरतक पहुँचानेके लिये गये ॥ ५६ ॥ निवर्तयित्वा कुरुराष्ट्रवर्धनां- स्ततः स सर्वान् विदुरं च वीर्यवान् । जनार्दनो दारुकमाह सत्वरः प्रचोदयाश्वानिति सात्यकिं तथा ॥ ५७ ॥ तदनन्तर पराक्रमी श्रीकृष्णने कौरवराज्यकी वृद्धि करनेवाले उन समस्त पाण्डवों तथा विदुरजीको लौटाकर दारुक तथा सात्यकिसे कहा—'अब घोड़ोंको जोरसे हाँको' ॥ ५७ ॥ ततो ययौ शत्रुगणप्रमर्दनः शिनिप्रवीरानुगतो जनार्दनः । यथा निहत्यारिगणं शतक्रतु- र्दिवं तथाऽऽनर्तपुरीं प्रतापवान् ॥ ५८ ॥ तत्पश्चात् शिनिवीर सात्यकिको साथ लिये शत्रुदलमर्दन प्रतापी श्रीकृष्ण आनर्तपुरी द्वारकाकी ओर उसी प्रकार चल दिये, जैसे प्रतापी इन्द्र अपने शत्रुसमुदायका संहार करके स्वर्गमें जा रहे हों ॥ ५८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि कृष्णप्रयाणे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकाको प्रस्थानविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५८ १/३ श्लोक हैं)

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः मार्गमें श्रीकृष्णसे कौरवोंके विनाशकी बात सुनकर उत्तङ्क मुनिका कुपित होना और श्रीकृष्णका उन्हें शान्त करना वैशम्पायन उवाच तथा प्रयान्तं वार्ष्णेयं द्वारकां भरतर्षभाः । परिष्वज्य न्यवर्तन्त सानुयात्राः परंतपाः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार द्वारका जाते हुए भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगाकर भरतवंशके श्रेष्ठ वीर शत्रुसंतापी पाण्डव अपने सेवकों-सहित पीछे लौटे ॥ १ ॥ पुनः पुनश्च वार्ष्णेयं पर्यष्वजत फाल्गुनः । आ चक्षुर्विषयाच्चैनं स ददर्श पुनः पुनः ॥ २ ॥ अर्जुनने वृष्णिवंशी प्यारे सखा श्रीकृष्णको बारंबार छातीसे लगाया और जबतक वे आँखोंसे ओझल नहीं हुए, तबतक उन्हींकी ओर वे बारंबार देखते रहे ॥ २ ॥ कृच्छ्रेणैव तु तां पार्थो गोविन्दे विनिवेशिताम् । संजहार ततो दृष्टिं कृष्णश्चाप्यपराजितः ॥ ३ ॥ जब रथ दूर चला गया, तब पार्थने बड़े कष्टसे श्रीकृष्णकी ओर लगी हुई अपनी दृष्टिको पीछे लौटाया। किसीसे पराजित न होनेवाले श्रीकृष्णकी भी यही दशा थी ॥ ३ ॥ तस्य प्रयाणे यान्यासन् निमित्तानि महात्मनः । बहून्यद्भुतरूपाणि तानि मे गदतः शृणु ॥ ४ ॥ महामना भगवान्‌की यात्राके समय जो बहुत-से अद्भुत शकुन प्रकट हुए, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥ वायुर्वेगेन महता रथस्य पुरतो ववौ । कुर्वन्निःशर्करं मार्गं विरजस्कमकण्टकम् ॥ ५ ॥ उनके रथके आगे बड़े वेगसे हवा आती और रास्तेकी धूल, कंकण तथा काँटोंको उड़ाकर अलग कर देती थी ॥ ५ ॥ ववर्ष वासवश्चैव तोयं शुचि सुगन्धि च । दिव्यानि चैव पुष्पाणि पुरतः शार्ङ्गधन्वनः ॥ ६ ॥ इन्द्र श्रीकृष्णके सामने पवित्र एवं सुगन्धित जल तथा दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करते थे ॥ ६ ॥ स प्रयातो महाबाहुः समेषु मरुधन्वसु ।

ददर्शाथ मुनिश्रेष्ठमुत्तङ्कममितौजसम् ॥ ७ ॥ इस प्रकार मरुभूमिके समतल प्रदेशमें पहुँचकर महाबाहु श्रीकृष्णने अमिततेजस्वी मुनिश्रेष्ठ उत्तंकका दर्शन किया ॥ ७ ॥ स तं सम्पूज्य तेजस्वी मुनिं पृथुललोचनः । पूजितस्तेन च तदा पर्यपृच्छदनामयम् ॥ ८ ॥ विशाल नेत्रोंवाले तेजस्वी श्रीकृष्ण उत्तंक मुनिकी पूजा करके स्वयं भी उनके द्वारा पूजित हुए। तत्पश्चात् उन्होंने मुनिका कुशल-समाचार पूछा ॥ ८ ॥ स पृष्टः कुशलं तेन सम्पूज्य मधुसूदनम् । उत्तङ्को ब्राह्मणश्रेष्ठस्ततः पप्रच्छ माधवम् ॥ ९ ॥ उनके कुशल-मंगल पूछनेपर विप्रवर उत्तंकने भी मधुसूदन माधवकी पूजा करके उनसे इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ ९ ॥ कच्चिच्छौरे त्वया गत्वा कुरुपाण्डवसद्म तत् । कृतं सौभ्रात्रमचलं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १० ॥ 'शूरनन्दन! क्या तुम कौरवों और पाण्डवोंके घर जाकर उनमें अविचल भ्रातृभाव स्थापित कर आये? यह बात मुझे विस्तारके साथ बताओ ॥ १० ॥ अपि संधाय तान् वीरानुपावृत्तोऽसि केशव । सम्बन्धिनः स्वदयितान् सततं वृष्णिपुङ्गव ॥ ११ ॥ केशव! क्या तुम उन वीरोंमें संधि कराकर ही लौट रहे हो? वृष्णिपुंगव! वे कौरव, पाण्डव तुम्हारे सम्बन्धी तथा तुम्हें सदा ही परम प्रिय रहे हैं ॥ ११ ॥ कच्चित् पाण्डुसुताः पञ्च धृतराष्ट्रस्य चात्मजाः । लोकेषु विहरिष्यन्ति त्वया सह परंतप ॥ १२ ॥ 'परंतप! क्या पाण्डुके पाँचों पुत्र और धृतराष्ट्रके भी सभी आत्मज संसारमें तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचर सकेंगे? ॥ स्वराष्ट्रे ते च राजानः कच्चित् प्राप्स्यन्ति वै सुखम् । कौरवेषु प्रशान्तेषु त्वया नाथेन केशव ॥ १३ ॥ 'केशव! तुम-जैसे रक्षक एवं स्वामीके द्वारा कौरवोंके शान्त कर दिये जानेपर अब पाण्डवनरेशोंको अपने राज्यमें सुख तो मिलेगा न? ॥ १३ ॥ या मे सम्भावना तात त्वयि नित्यमवर्तत । अपि सा सफला तात कृता ते भरतान् प्रति ॥ १४ ॥ 'तात! मैं सदा तुमसे इस बातकी सम्भावना करता था कि तुम्हारे प्रयत्नसे कौरव- पाण्डवोंमें मेल हो जायगा। मेरी जो वह सम्भावना थी, भरतवंशियोंके सम्बन्धमें तुमने वह सफल तो किया है न?' ॥ १४ ॥ श्रीभगवानुवाच

कृतो यत्नो मया पूर्वं सौशाम्ये कौरवान् प्रति । नाशकयन्त यदा साम्ये ते स्थापितुमञ्जसा ॥ १५ ॥ ततस्ते निधनं प्राप्ताः सर्वे ससुतबान्धवाः । श्रीभगवान्ने कहा—महर्षे! मैंने पहले कौरवोंके पास जाकर उन्हें शान्त करनेके लिये बड़ा प्रयत्न किया, परंतु वे किसी तरह संधिके लिये तैयार न किये जा सके। जब उन्हें समतापूर्ण मार्गमें स्थापित करना असम्भव हो गया, तब वे सब-के-सब अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित युद्धमें मारे गये ।। १५ १/२ ।। न दिष्टमप्यतिक्रान्तुं शक्यं बुद्ध्या बलेन वा ॥ १६ ॥ महर्षे विदितं भूयः सर्वमेतत् तवानघ । तेऽत्यक्रामन् मतिं मह्यं भीष्मस्य विदुरस्य च ॥ १७ ॥ महर्षे! प्रारब्धके विधानको कोई बुद्धि अथवा बलसे नहीं मिटा सकता। अनघ! आपको तो ये सब बातें मालूम ही होंगी कि कौरवोंने मेरी, भीष्मजीकी तथा विदुरजीकी सम्मतिको भी ठुकरा दिया ।। १६-१७ ।। ततो यमक्षयं जग्मुः समासाद्येतरेतरम् । पञ्चैव पाण्डवाः शिष्टा हतामित्रा हतात्मजाः । धार्तराष्ट्राश्च निहताः सर्वे ससुतबान्धवाः ॥ १८ ॥ इसीलिये वे आपसमें लड़-भिड़कर यमलोक जा पहुँचे। इस युद्धमें केवल पाँच पाण्डव ही अपने शत्रुओंको मारकर जीवित बच गये हैं। उनके पुत्र भी मार डाले गये हैं। धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, जो गान्धारीके पेटसे पैदा हुए थे, अपने पुत्र और बान्धवोंसहित नष्ट हो गये ।। १८ ।। इत्युक्तवचने कृष्णे भृशं क्रोधसमन्वितः । उत्तङ्क इत्युवाचैनं रोषादुत्फुल्ललोचनः ॥ १९ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके इतना कहते ही उत्तंक मुनि अत्यन्त क्रोधसे जल उठे और रोषसे आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे। उन्होंने श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा ।। १९ ।। उत्तङ्क उवाच यस्माच्छक्तेन ते कृष्ण न त्राताः कुरुपुङ्गवाः । सम्बन्धिनः प्रियास्तस्माच्छप्स्येऽहं त्वामसंशयम् ॥ २० ॥ उत्तंक बोले—श्रीकृष्ण! कौरव तुम्हारे प्रिय सम्बन्धी थे, तथापि शक्ति रखते हुए भी तुमने उनकी रक्षा न की। इसलिये मैं तुम्हें अवश्य शाप दूँगा ।। २० ।। न च ते प्रसभां यस्मात् ते निगृह्य निवारिताः । तस्मान्मन्युपरीतस्त्वां शप्स्यामि मधुसूदन ॥ २१ ॥

मधुसूदन! तुम उन्हें जबर्दस्ती पकड़कर रोक सकते थे, पर ऐसा नहीं किया। इसलिये मैं क्रोधमें भरकर तुम्हें शाप दूँगा ।। २१ ।। त्वया शक्तेन हि सता मिथ्याचारेण माधव । ते परीताः कुरुश्रेष्ठा नश्यन्तः स्म ह्युपेक्षिताः ।। २२ ।। माधव! कितने खेदकी बात है, तुमने समर्थ होते हुए भी मिथ्याचारका आश्रय लिया। युद्धमें सब ओरसे आये हुए वे श्रेष्ठ कुरुवंशी नष्ट हो गये और तुमने उनकी उपेक्षा कर दी ।। २२ ।। वासुदेव उवाच शृणु मे विस्तरेणेदं यद् वक्ष्ये भृगुनन्दन । गृहाणानुनयं चापि तपस्वी ह्यसि भार्गव ।। २३ ।। श्रीकृष्णने कहा—भृगुनन्दन! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे विस्तारपूर्वक सुनिये। भार्गव! आप तपस्वी हैं, इसलिये मेरी अनुनय-विनय स्वीकार कीजिये ।। २३ ।। श्रुत्वा च मे तदध्यात्मं मुञ्चेथाः शापमद्य वै । न च मां तपसाल्पेन शक्तोऽभिभवितुं पुमान् ।। २४ ।। न च ते तपसो नाशमिच्छामि तपतां वर । मैं आपको अध्यात्मतत्त्व सुना रहा हूँ। उसे सुननेके पश्चात् यदि आपकी इच्छा हो तो आज मुझे शाप दीजियेगा। तपस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ महर्षे! आप यह याद रखिये कि कोई भी पुरुष थोड़ी-सी तपस्याके बलपर मेरा तिरस्कार नहीं कर सकता। मैं नहीं चाहता कि आपकी तपस्या नष्ट हो जाय ।। २४ १/२ ।। तपस्ते सुमहद्दीप्तं गुरवश्चापि तोषिताः ।। २५ ।। कौमारं ब्रह्मचर्यं ते जानामि द्विजसत्तम । दुःखार्जितस्य तपसस्तस्मान्नेच्छामि ते व्ययम् ।। २६ ।। आपका तप और तेज बहुत बढ़ा हुआ है। आपने गुरुजनोंको भी सेवासे संतुष्ट किया है। द्विजश्रेष्ठ! आपने बाल्यावस्थासे ही ब्रह्मचर्यका पालन किया है। ये सारी बातें मुझे अच्छी तरह ज्ञात हैं। इसलिये अत्यन्त कष्ट सहकर संचित किये हुए आपके तपका मैं नाश कराना नहीं चाहता हूँ ।। २५-२६ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने कृष्णोत्तङ्कसमागमे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तङ्कके उपाख्यानमें श्रीकृष्ण और उत्तङ्कका समागमविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५३ ।।

चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना उत्तङ्क उवाच ब्रूहि केशव तत्त्वेन त्वमध्यात्ममनिन्दितम् । श्रुत्वा श्रेयोऽभिधास्यामि शापं वा ते जनार्दन ॥ १ ॥ उत्तंकने कहा—केशव! जनार्दन! तुम यथार्थरूपसे उत्तम अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करो। उसे सुनकर मैं तुम्हारे कल्याणके लिये आशीर्वाद दूँगा अथवा शाप प्रदान करूँगा ॥ वासुदेव उवाच तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि भावान् मदाश्रयान् । तथा रुद्रान् वसून् वापि विद्धि मत्प्रभवान् द्विज ॥ २ ॥ श्रीकृष्णने कहा—ब्रह्मर्षे! आपको यह विदित होना चाहिये कि तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण—ये सभी भाव मेरे ही आश्रित हैं। रुद्रों और वसुओंको भी आप मुझसे ही उत्पन्न जानिये ॥ २ ॥ मयि सर्वाणि भूतानि सर्वभूतेषु चाप्यहम् । स्थित इत्यभिजानीहि मा तेऽभूदत्र संशयः ॥ ३ ॥ सम्पूर्ण भूत मुझमें हैं और सम्पूर्ण भूतोंमें मैं स्थित हूँ। इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें। इसमें आपको संशय नहीं होना चाहिये ॥ ३ ॥ तथा दैत्यगणान् सर्वान् यक्षगन्धर्वराक्षसान् । नागानप्सरसश्चैव विद्धि मत्प्रभवान् द्विज ॥ ४ ॥ विप्रवर! सम्पूर्ण दैत्यगण, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग और अप्सराओंको मुझसे ही उत्पन्न जानिये ॥ ४ ॥ सदसच्चैव यत् प्राहुरव्यक्तं व्यक्तमेव च । अक्षरं च क्षरं चैव सर्वमेतन्मदात्मकम् ॥ ५ ॥ विद्वान् लोग जिसे सत्-असत्, व्यक्त-अव्यक्त और क्षर-अक्षर कहते हैं, यह सब मेरा ही स्वरूप है ॥ ५ ॥ ये चाश्रमेषु वै धर्माश्चतुर्धा विदिता मुने । वैदिकानि च सर्वाणि विद्धि सर्वं मदात्मकम् ॥ ६ ॥

मुने! चारों आश्रमोंमें जो चार प्रकारके धर्म प्रसिद्ध हैं तथा जो सम्पूर्ण वेदोक्त कर्म हैं, उन सबको मेरा स्वरूप ही समझिये ।। ६ ।। असच्च सदसच्चैव यद् विश्वं सदसत् परम् । मत्तः परतरं नास्ति देवदेवात् सनातनात् ।। ७ ।। असत्, सदसत् तथा उससे भी परे जो अव्यक्त जगत् है, वह भी मुझ सनातन देवाधिदेवसे पृथक् नहीं है ।। ७ ।। ओङ्कारप्रमुखान् वेदान् विद्धि मां त्वं भृगूद्वह । यूपं सोमं चरुं होमं त्रिदशाप्यायनं मखे ।। ८ ।। होतारमपि हव्यं च विद्धि मां भृगुनन्दन । अध्वर्युः कल्पकश्चापि हविः परमसंस्कृतम् ।। ९ ।। भृगुश्रेष्ठ! ॐकारसे आरम्भ होनेवाले चारों वेद मुझे ही समझिये। यज्ञमें यूप, सोम, चरु, देवताओंको तृप्त करनेवाला होम, होता और हवन-सामग्री भी मुझे ही जानिये। भृगुनन्दन! अध्वर्यु, कल्पक और अच्छी प्रकार संस्कार किया हुआ हविष्य—ये सब मेरे ही स्वरूप हैं ।। उद्गाता चापि मां स्तौति गीताघोषैर्महाध्वरे । प्रायश्चित्तेषु मां ब्रह्मन् शान्तिमङ्गलवाचकाः ।। १० ।। स्तुवन्ति विश्वकर्माणं सततं द्विजसत्तम । मम विद्धि सुतं धर्ममग्रजं द्विजसत्तम ।। ११ ।। मानसं दयितं विप्र सर्वभूतदयात्मकम् । बड़े-बड़े यज्ञोंमें उद्गाता उच्च स्वरसे सामगान करके मेरी ही स्तुति करते हैं। ब्रह्मन्! प्रायश्चित्त-कर्ममें शान्तिपाठ तथा मंगलपाठ करनेवाले ब्राह्मण सदा मुझ विश्वकर्माका ही स्तवन करते हैं। द्विजश्रेष्ठ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करना-रूप जो धर्म है, वह मेरा परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्र है। मेरे मनसे उसका प्रादुर्भाव हुआ है ।। १०-११ १/२ ।। तत्राहं वर्तमानैश्च निवृत्तैश्चैव मानवैः ।। १२ ।। बह्वीः संसरमाणो वै योनीर्वर्तामि सत्तम । धर्मसंरक्षणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ।। १३ ।। तैस्तैर्वेषैश्च रूपैश्च त्रिषु लोकेषु भार्गव । भार्गव! उस धर्ममें प्रवृत्त होकर जो पाप-कर्मोंसे निवृत्त हो गये हैं ऐसे मनुष्योंके साथ मैं सदा निवास करता हूँ। साधुशिरोमणे! मैं धर्मकी रक्षा और स्थापनाके लिये तीनों लोकोंमें बहुत-सी योनियोंमें अवतार धारण करके उन-उन रूपों और वेषोंद्वारा तदनुरूप बर्ताव करता हूँ ।। १२-१३ १/२ ।। अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शक्रोऽथ प्रभवाप्ययः ।। १४ ।।

भूतग्रामस्य सर्वस्य स्रष्टा संहार एव च। मैं ही विष्णु, मैं ही ब्रह्मा और मैं ही इन्द्र हूँ। सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कारण भी मैं ही हूँ। समस्त प्राणिसमुदायकी सृष्टि और संहार भी मेरे ही द्वारा होते हैं।। १४ १/३ ।। अधर्मे वर्तमानानां सर्वेषामहमच्युतः ।। १५ ।। धर्मस्य सेतुं बध्नामि चलिते चलिते युगे। तास्ता योनीः प्रविश्याहं प्रजानां हितकाम्यया ।। १६ ।। अधर्ममें लगे हुए सभी मनुष्योंको दण्ड देनेवाला और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाला ईश्वर मैं ही हूँ। जब-जब युगका परिवर्तन होता है, तब-तब मैं प्रजाकी भलाईके लिये भिन्न-भिन्न योनियोंमें प्रविष्ट होकर धर्ममर्यादाकी स्थापना करता हूँ ।। १५-१६ ।। यदा त्वहं देवयोनौ वर्तामि भृगुनन्दन। तदाहं देववत् सर्वमाचरामि न संशयः ।। १७ ।। भृगुनन्दन! जब मैं देवयोनिमें अवतार लेता हूँ, तब देवताओंकी ही भाँति सारे आचार- विचारका पालन करता हूँ, इसमें संशय नहीं है ।। १७ ।। यदा गन्धर्वयोनौ वा वर्तामि भृगुनन्दन। तदा गन्धर्ववत् सर्वमाचरामि न संशयः ।। १८ ।। भृगुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले महर्षे! जब मैं गन्धर्व-योनिमें प्रकट होता हूँ, तब मेरे सारे आचार-विचार गन्धर्वोंके ही समान होते हैं, इसमें संदेह नहीं है ।। नागयोनौ यदा चैव तदा वर्तामि नागवत्। यक्षराक्षसयोन्योस्तु यथावद् विचराम्यहम् ।। १९ ।। जब मैं नागयोनिमें जन्म ग्रहण करता हूँ, तब नागोंकी तरह बर्ताव करता हूँ। यक्षों और राक्षसोंकी योनियोंमें प्रकट होनेपर उन्हींके आचार-विचारका यथावत् रूपसे पालन करता हूँ ।। १९ ।। मानुष्ये वर्तमाने तु कृपणं याचिता मया। न च ते जातसम्मोहा वचोऽगृह्णन्त मे हितम् ।। २० ।। इस समय मैं मनुष्ययोनिमें अवतीर्ण हुआ हूँ, इसलिये कौरवोंपर अपनी ईश्वरीय शक्तिका प्रयोग न करके पहले मैंने दीनतापूर्वक ही संधिके लिये प्रार्थना की थी; परंतु उन्होंने मोहग्रस्त होनेके कारण मेरी हितकर बात नहीं मानी ।। २० ।।

उत्तङ्कमुनिकी श्रीकृष्णसे विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना

भयं च महदुद्दिश्य त्रासिताः कुरवो मया । क्रुद्धेन भूत्वा तु पुनर्यथावदनुदर्शिताः ॥ २१ ॥ तेऽधर्मेणेह संयुक्ताः परीताः कालधर्मणा । धर्मेण निहता युद्धे गताः स्वर्गं न संशयः ॥ २२ ॥ इसके बाद क्रोधमें भरकर मैंने कौरवोंको बड़े-बड़े भय दिखाये और उन्हें बहुत डराया- धमकाया तथा यथार्थरूपसे युद्धका भावी परिणाम भी उन्हें दिखाया; परंतु वे तो अधर्मसे युक्त एवं कालसे ग्रस्त थे। अतः मेरी बात माननेको राजी न हुए। फिर क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्धमें मारे गये। इसमें संदेह नहीं कि वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ २१-२२ ॥ लोकेषु पाण्डवाश्चैव गताः ख्यातिं द्विजोत्तम । एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २३ ॥ द्विजश्रेष्ठ! पाण्डव अपने धर्माचरणके कारण समस्त लोकोंमें विख्यात हुए हैं। आपने जो कुछ पूछा था, उसके अनुसार मैंने यह सारा प्रसङ्ग कह सुनाया ॥ २३ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने कृष्णवाक्ये चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंकके उपाख्यानमें श्रीकृष्णका वचनविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥