अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 364, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्होंने वहाँ सुवर्णके बने हुए तोरण, शय्या, आसन, विहारस्थान तथा बहुत-से रत्नोंके ढेर देखे ।। २९ ।। घटान् पात्री: कटाहानि कलशान् वर्धमानकान् । न हि किञ्चिदसौवर्णमपश्यन् वसुधाधिपा: ।। ३० ।। घड़े, बर्तन, कड़ाहे, कलश और बहुत-से कटोरे भी उनकी दृष्टिमें पड़े। उन पृथ्वीपतियोंने वहाँ कोई भी ऐसा सामान नहीं देखा, जो सोनेका बना हुआ न हो ।। ३० ।। यूपांश्च शास्त्रपठितान् दारवान् हेमभूषितान् । उपक्लृप्तान् यथाकालं विधिवद् भूरिवर्चस: ।। ३१ ।। शास्त्रोक्त विधिके अनुसार जो काष्ठके यूप बने हुए थे, उनमें भी सोना जड़ा हुआ था। वे सभी यूप यथासमय विधिपूर्वक बनाये गये थे जो देखनेमें अत्यन्त तेजोमय जान पड़ते थे ।। ३१ ।। स्थलजा जलजा ये च पशव: केचन प्रभो । सर्वानैव समानीतानपश्यंस्तत्र ते नृपा: ।। ३२ ।। प्रभो! संसारके भीतर स्थल और जलमें उत्पन्न होनेवाले जो कोई पशु देखे या सुने गये थे, उन सबको वहाँ राजाओंने उपस्थित देखा ।। ३२ ।। गाश्चैव महिषीश्चैव तथा वृद्धस्त्रियोऽपि च । औदकानि च सत्त्वानि श्वापदानि वयांसि च ।। ३३ ।। जरायुजाण्डजातानि स्वेदजान्युद्धिजानि च । पर्वतानूपजातानि भूतानि ददृशुश्च ते ।। ३४ ।। गायें, भैंसें, बूढ़ी स्त्रियाँ, जल-जन्तु, हिंसक जन्तु, पक्षी, जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज, पर्वतीय तथा सागरतटपर उत्पन्न होनेवाले प्राणी—ये सभी वहाँ दृष्टिगोचर हुए ।। ३३-३४ ।। एवं प्रमुदितं सर्वं पशुगोधनधान्यतः । यज्ञवाटं नृपा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता: ।। ३५ ।। इस प्रकार वह यज्ञशाला पशु, गौ, धन और धान्य सभी दृष्टियोंसे सम्पन्न एवं आनन्द बढ़ानेवाली थी। उसे देखकर समस्त राजाओंको बड़ा विस्मय हुआ ।। ३५ ।। ब्राह्मणानां विशां चैव बहुमृष्टान्नमुद्धिमत् । पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां तत्र भुञ्जताम् ।। ३६ ।। दुन्दुभिर्मेघनिर्घोषो मुहुर्मुहुरताडयत् । विननादासकृच्चापि दिवसे दिवसे गते ।। ३७ ।। ब्राह्मणों और वैश्योंके लिये वहाँ परम स्वादिष्ट अन्नका भण्डार भरा हुआ था। प्रतिदिन एक लाख ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर वहाँ मेघ-गर्जनाके समान शब्द करनेवाला डंका बार-बार पीटा जाता था। इस प्रकारके डंके वहाँ दिनमें कई बार पीटे जाते थे ।।