अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 363, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंबुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके उस महायज्ञमें बहुत-से वेदवेत्ता मुनिगण भी पधारे थे ॥ २२ ॥ ये च द्विजातिप्रवरास्तत्रासन् पृथिवीपते । समाजग्मुः सशिष्यास्तान् प्रतिजग्राह कौरवः ॥ २३ ॥ पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणोंमें जो श्रेष्ठ पुरुष थे, वे सब अपने शिष्योंको साथ लेकर वहाँ आये। कुरुराज युधिष्ठिरने उन सबको स्वागतपूर्वक अपनाया ॥ २३ ॥ सर्वांश्च ताननुययौ यावदावसथान् प्रति । स्वयमेव महातेजा दम्भं त्यक्त्वा युधिष्ठिरः ॥ २४ ॥ वहाँ महातेजस्वी महाराज युधिष्ठिर दम्भ छोड़कर स्वयं ही उन सबका विधिवत् सत्कार करते और जबतक उनके लिये योग्य स्थानका प्रबन्ध न हो जाता, तबतक उनके साथ-साथ रहते थे ॥ २४ ॥ ततः कृत्वा स्थपतयः शिल्पिनोऽन्ये च ये तदा । कृत्स्नं यज्ञविधिं राज्ञो धर्मज्ञाय न्यवेदयन् ॥ २५ ॥ तत्पश्चात् थवइयों और अन्यान्य शिल्पियों (कारीगरों) ने आकर राजा युधिष्ठिरको यह सूचना दी कि यज्ञमण्डपका सारा कार्य पूरा हो गया ॥ २५ ॥ तच्छ्रुत्वा धर्मराजस्तु कृतं सर्वमतन्द्रितः । हृष्टरूपोऽभवद् राजा सह भ्रातृभिरादृतः ॥ २६ ॥ सब कार्य पूरा हो गया। यह सुनकर आलस्य-रहित धर्मराज राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ बहुत प्रसन्न हुए ॥ २६ ॥ वैशम्पायन उवाच तस्मिन् यज्ञे प्रवृत्ते तु वाग्मिनो हेतुवादिनः । हेतुवादान् बहूनाहुः परस्परजिगीषवः ॥ २७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! वह यज्ञ आरम्भ होनेपर बहुत-से प्रवचनकुशल और युक्तिवादी विद्वान्, जो एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखते थे, वहाँ अनेक प्रकारसे तर्ककी बातें करने लगे ॥ २७ ॥ ददृशुस्तं नृपतयो यज्ञस्य विधिमुत्तमम् । देवेन्द्रस्येव विहितं भीमसेनेन भारत ॥ २८ ॥ भारत! यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये आये हुए राजा लोग घूम-घूमकर भीमसेनके द्वारा तैयार कराये हुए उस यज्ञमण्डपकी उत्तम निर्माण कला एवं सुन्दर सजावट देखने लगे। वह मण्डप देवराज इन्द्रकी यज्ञशालाके समान जान पड़ता था ॥ २८ ॥ ददृशुस्तोरणान्यत्र शातकुम्भमयानि ते । शय्यासनविहारांश्च सुबहून् रत्नसंचयान् ॥ २९ ॥