अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशोऽध्यायः दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । निबोध दशहोतॄणां विधानमथ यादृशम् ॥ १ ॥ ब्राह्मण कहते हैं—प्रिये! इस विषयमें विद्वान् पुरुष इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। दस होता मिलकर जिस प्रकार यज्ञका अनुष्ठान करते हैं, वह सुनो ॥ १ ॥ श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चरणौ करौ । उपस्थं वायुरिति वा होतॄणि दश भामिनि ॥ २ ॥ भामिनि! कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा (वाक् और रसना), नासिका, हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा—ये दस होता हैं ॥ २ ॥ शब्दस्पर्शौ रूपरसौ गन्धो वाक्यं क्रिया गतिः । रेतोमूत्रपुरीषाणां त्यागो दश हवींषि च ॥ ३ ॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वाणी, क्रिया, गति, वीर्य, मूत्रका त्याग और मल-त्याग— ये दस विषय ही दस हविष्य हैं ॥ ३ ॥ दिशो वायु रविश्चन्द्रः पृथ्व्यग्नी विष्णुरेव च । इन्द्रः प्रजापतिर्मित्रमग्नयो दश भामिनि ॥ ४ ॥ भामिनि! दिशा, वायु, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्नि, विष्णु, इन्द्र, प्रजापति और मित्र—ये दस देवता अग्नि हैं ॥ ४ ॥ दशेन्द्रियाणि होतॄणि हवींषि दश भाविनि । विषया नाम समिधो हूयन्ते तु दशाग्निषु ॥ ५ ॥ भाविनि! दस इन्द्रियरूपी होता दस देवतारूपी अग्निमें दस विषयरूपी हविष्य एवं समिधाओंका हवन करते हैं (इस प्रकार मेरे अन्तरमें निरन्तर यज्ञ हो रहा है; फिर मैं अकर्मण्य कैसे हूँ?) ॥ ५ ॥ चित्तं स्रुवश्च वित्तं च पवित्रं ज्ञानमुत्तमम् । सुविभक्तमिदं सर्वं जगदासीदिति श्रुतम् ॥ ६ ॥ इस यज्ञमें चित्त ही स्रुवा तथा पवित्र एवं उत्तम ज्ञान ही धन है। यह सम्पूर्ण जगत् पहले भलीभाँति विभक्त था—ऐसा सुना गया है ॥ ६ ॥ सर्वमेवाथ विज्ञेयं चित्तं ज्ञानमवेक्षते ।