अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरेतःशरीरभृत्काये विज्ञाता तु शरीरभृत् ॥ ७ ॥ जाननेमें आनेवाला यह सारा जगत् चित्तरूप ही है, वह ज्ञानकी अर्थात् प्रकाशककी अपेक्षा रखता है तथा वीर्यजनित शरीर-समुदायमें रहनेवाला शरीरधारी जीव उसको जाननेवाला है ॥ ७ ॥ शरीरभृद् गार्हपत्यस्तस्मादन्यः प्रणीयते । मनश्चाहवनीयस्तु तस्मिन् प्रक्षिप्यते हविः ॥ ८ ॥ वह शरीरका अभिमानी जीव गार्हपत्य अग्नि है। उससे जो दूसरा पावक प्रकट होता है, वह मन है। मन आहवनीय अग्नि है। उसीमें पूर्वोक्त हविष्यकी आहुति दी जाती है ॥ ८ ॥ ततो वाचस्पतिर्जज्ञे तं मनः पर्यवेक्षते । रूपं भवति वैवर्णं समनुद्रवते मनः ॥ ९ ॥ उससे वाचस्पति (वेदवाणी)-का प्राकट्य होता है। उसे मन देखता है। मनके अनन्तर रूपका प्रादुर्भाव होता है, जो नील-पीत आदि वर्णोंसे रहित होता है। वह रूप मनकी ओर दौड़ता है ॥ ९ ॥ ब्राह्मण्युवाच कस्माद् वागभवत् पूर्वं कस्मात् पश्चान्मनोऽभवत् । मनसा चिन्तितं वाक्यं यदा समभिपद्यते ॥ १० ॥ ब्राह्मणी बोली—प्रियतम! किस कारणसे वाक्की उत्पत्ति पहले हुई और क्यों मन पीछे हुआ? जब कि मनसे सोचे-विचारे वचनको ही व्यवहारमें लाया जाता है ॥ १० ॥ केन विज्ञानयोगेन मतिश्चित्तं समास्थिता । समुन्नीता नाध्यगच्छत् को वै तां प्रतिबाधते ॥ ११ ॥ किस विज्ञानके प्रभावसे मति चित्तके आश्रित होती है? वह ऊँचे उठायी जानेपर विषयोंकी ओर क्यों नहीं जाती? कौन उसके मार्गमें बाधा डालता है? ॥ ११ ॥ ब्राह्मण उवाच तामपानः पतिर्भूत्वा तस्मात् प्रेषत्यपानताम् । तां गतिं मनसः प्राहर्मनस्तस्मादपेक्षते ॥ १२ ॥ ब्राह्मणने कहा—प्रिये! अपान पतिरूप होकर उस मतिको अपानभावकी ओर ले जाता है। वह अपानभावकी प्राप्ति मनकी गति बतायी गयी है, इसलिये मन उसकी अपेक्षा रखता है ॥ १२ ॥ प्रश्नं तु वाङ्मनसोर्मा यस्मात् त्वमनुपृच्छसि । तस्मात् ते वर्तयिष्यामि तयोरेव समाह्वयम् ॥ १३ ॥