अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'तुममें कौन-सा बल और कितना शास्त्रज्ञान है? तुम किसके सहारे रहते हो? हमें किस तरह तुम्हारा परिचय प्राप्त होगा? तुम कौन हो, जो हमारे इस यज्ञकी निन्दा करते हो? ॥ १० ॥ अविलुप्यागमं कृत्स्नं विविधैर्यज्ञियैः कृतम् । यथागमं यथान्यायं कर्तव्यं च तथा कृतम् ॥ ११ ॥ 'हमने नाना प्रकारकी यज्ञ-सामग्री एकत्रित करके शास्त्रीय विधिकी अवहेलना न करते हुए इस यज्ञको पूर्ण किया है। इसमें शास्त्रसंगत और न्याययुक्त प्रत्येक कर्तव्य-कर्मका यथोचित पालन किया गया है ॥ ११ ॥ पूजार्हाः पूजिताश्चात्र विधिवच्छास्त्रदर्शनात् । मन्त्राहूतिहुतश्चाग्निर्दत्तं देयममत्सरम् ॥ १२ ॥ 'इसमें शास्त्रीय दृष्टिसे पूजनीय पुरुषोंकी विधिवत् पूजा की गयी है। अग्निमें मन्त्र पढ़कर आहुति दी गयी है और देनेयोग्य वस्तुओंका ईर्ष्यारहित होकर दान किया गया है ॥ १२ ॥ तुष्टा द्विजातयश्चात्र दानैर्बहुविधैरपि । क्षत्रियाश्च सुयुद्धेन श्राद्धैश्चापि पितामहाः ॥ १३ ॥ पालनेन विशस्तुष्टाः कामैस्तुष्टा वरस्त्रियः । अनुक्रोशस्तथा शूद्रा दानशेषैः पृथग्जनाः ॥ १४ ॥ ज्ञातिसम्बन्धिनस्तुष्टाः शौचेन च नृपस्य नः । देवा हविर्भिः पुण्यैश्च रक्षणैः शरणागताः ॥ १५ ॥ 'यहाँ नाना प्रकारके दानोंसे ब्राह्मणोंको, उत्तम युद्धके द्वारा क्षत्रियोंको, श्राद्धके द्वारा पितामहोंको, रक्षाके द्वारा वैश्योंको, सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करके उत्तम स्त्रियोंको, दयासे शूद्रोंको, दानसे बची हुई वस्तुएँ देकर अन्य मनुष्योंको तथा राजाके शुद्ध बर्तावसे ज्ञाति एवं सम्बन्धियोंको संतुष्ट किया गया है। इसी प्रकार पवित्र हविष्यके द्वारा देवताओंको और रक्षाका भार लेकर शरणागतोंको प्रसन्न किया गया है ॥ १३-१५ ॥ यदत्र तथ्यं तद् ब्रूहि सत्यं सत्यं द्विजातिषु । यथाश्रुतं यथादृष्टं पृष्टो ब्राह्मणकाम्यया ॥ १६ ॥ श्रद्धेयवाक्यः प्राज्ञस्त्वं दिव्यं रूपं बिभर्षि च । समागतश्च विप्रैस्त्वं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १७ ॥ 'यह सब होनेपर भी तुमने क्या देखा या सुना है, जिससे इस यज्ञपर आक्षेप करते हो? इन ब्राह्मणोंके निकट इनके इच्छानुसार पूछे जानेपर तुम सच-सच बताओ; क्योंकि तुम्हारी बातें विश्वासके योग्य जान पड़ती हैं। तुम स्वयं भी बुद्धिमान् दिखायी देते और दिव्यरूप धारण किये हुए हो। इस समय तुम्हारा ब्राह्मणोंके साथ समागम हुआ है, इसलिये तुम्हें हमारे प्रश्नका उत्तर अवश्य देना चाहिये' ॥ १६-१७ ॥