भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 392

इति पृष्टो द्विजैस्तैः स प्रहसन् नकुलोऽब्रवीत् । नैषा मृषा मया वाणी प्रोक्ता दर्पेण वा द्विजाः ॥ १८ ॥ उन ब्राह्मणोंके इस प्रकार पूछनेपर नेवलेने हँसकर कहा—‘विप्रवृन्द! मैंने आपलोगोंसे मिथ्या अथवा घमंडमें आकर कोई बात नहीं कही है ॥ १८ ॥ यन्मयोक्तमिदं वाक्यं युष्माभिश्चाप्युपश्रुतम् । सक्तुप्रस्थेन वो नायं यज्ञस्तुल्यो द्विजर्षभाः ॥ १९ ॥ ‘मैंने जो कहा है कि ‘द्विजवरो! आपलोगोंका यह यज्ञ उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणोंके द्वारा किये हुए सेरभर सत्तूदानके बराबर भी नहीं है’ इसे आपने ठीक-ठीक सुना है ॥ १९ ॥ इत्यवश्यं मयैतद् वो वक्तव्यं द्विजसत्तमाः । शृणुतावग्रमनसः शंसतो मे यथातथम् ॥ २० ॥ ‘श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इसका कारण अवश्य आपलोगोंको बताने योग्य है। अब मैं यथार्थरूपसे जो कुछ कहता हूँ, उसे आप लोग शान्तचित्त होकर सुनें ॥ २० ॥ अनुभूतं च दृष्टं च यन्मयाद्भुतमुत्तमम् । उञ्छवृत्तेर्वदान्यस्य कुरुक्षेत्रनिवासिनः ॥ २१ ॥ ‘कुरुक्षेत्रनिवासी उञ्छवृत्तिधारी दानी ब्राह्मणके सम्बन्धमें मैंने जो कुछ देखा और अनुभव किया है, वह बड़ा ही उत्तम एवं अद्भुत है’ ॥ २१ ॥ स्वर्गं येन द्विजाः प्राप्तः सभार्यः ससुतस्नुषः । यथा चार्धं शरीरस्य ममेदं काञ्चनीकृतम् ॥ २२ ॥ ‘ब्राह्मणो! उस दानके प्रभावसे पत्नी, पुत्र और पुत्रवधूसहित उन द्विजश्रेष्ठने जिस प्रकार स्वर्गलोकपर अधिकार पा लिया और वहाँ जिस तरह उन्होंने मेरा यह आधा शरीर सुवर्णमय कर दिया, वह प्रसंग बता रहा हूँ’ ॥ २२ ॥ नकुल उवाच हन्त वो वर्तयिष्यामि दानस्य फलमुत्तमम् । न्यायलब्धस्य सूक्ष्मस्य विप्रदत्तस्य यद् द्विजाः ॥ २३ ॥ नकुल बोला—ब्राह्मणो! कुरुक्षेत्रनिवासी द्विजके द्वारा दिये गये न्यायोपार्जित थोड़े-से अन्नके दानका जो उत्तम फल देखनेमें आया है, उसे मैं आपलोगोंको बतलाता हूँ ॥ २३ ॥ धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे धर्मज्ञैर्बहुभिर्वृते । उञ्छवृत्तिर्द्विजः कश्चित् कापोतिरभवत् तदा ॥ २४ ॥ कुछ दिनों पहलेकी बात है, धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रमें, जहाँ बहुत-से धर्मज्ञ महात्मा रहा करते हैं, कोई ब्राह्मण रहते थे। वे उञ्छवृत्तिसे अपना जीवन-निर्वाह करते थे। कबूतरके समान अन्नका दाना चुनकर लाते और उसीसे कुटुम्बका पालन करते थे ॥ २४ ॥ सभार्यः सह पुत्रेण सस्नुषस्तपसि स्थितः ।